स्वराज पर गाँधीजी के विचार

Hello दोस्तों, ज्ञानोदय में आपका एक बार फिर स्वागत है । आज हम आपके लिए लेकर आए हैं, ‘स्वराज पर गांधीजी के विचार’ । हम सभी जानते हैं, महात्मा गाँधी के विषय में, गांधी जी ने आजादी में अपना बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

गाँधीजी ने बहुत सारे आंदोलन चलाए । इसके अलावा गांधी जी ने स्वराज के ऊपर अपने महत्वपूर्ण विचार दिए हैं । गांधी जी का कहना था कि स्वराज का दूसरा नाम ही प्रशासन है । स्वराज का मतलब होता है, खुद के ऊपर खुद का ही शासन । सरकार चाहे देसी हो या विदेशी हो । उनका मानना था कि सरकार तो सरकार ही है । यानी हमें अपने ऊपर खुद ही शासन करना चाहिए ।

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यह आपके B. A. Programme 1st Year Political Science के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण Topic है, क्योंकि आपके Exams में अक्सर गाँधीजी के स्वराज पर विचार का Question बनता ही है । तो यह आपके Exams के लिए बहुत Important Topic है । आइये जानते हैं, गांधीजी ने स्वराज के ऊपर अपने क्या विचार दिए थे ?

राज्य हिंसा पर आधारित

हम सब जानते हैं कि राज्य होने के बहुत सारे फायदे हैं । राज्य से बहुत सारी सुविधाएं मिलती हैं । आपको अच्छे विद्यालय (Schools/ Colleges) मिलते हैं । आपको अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, अच्छे हॉस्पिटल मिलते हैं । रोज़गार का सृजन होता है । अगर आपको राज्य से 90% फायदे हैं, तो 10% नुकसान भी होते हैं । जैसे राज्य को अनेको समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है जैसे आपसी लड़ाई, लूटपाट, दंगे आदि ।

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इसलिए गांधी जी कहते हैं कि राज्य हिंसा पर आधारित है । लेकिन हम सब जानते हैं कि राज्य के पीछे शक्ति होती है और जो गांधी जी ने अपने विचार दिए हैं, उस पर गांधी जी ने ऐसे राज्य की कल्पना की है जो हर समस्या से मुक्त हो । गाँधी जी के अनुसार राज्य हिंसा पर आधारित होता है । तो वह चाहते थे कि किसी भी सरकार का किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होना चाहिए क्योंकि सरकार तो सरकार ही रहने वाली है । वह चाहते थे कि किसी भी इंसान के ऊपर किसी और का शासन ना हो । यानी वह इंसान अपनी मर्जी से जो चाहे वह कर सकता है । गाँधीजी ने उसे “प्रबुद्ध अराजकता की स्थिति” कहा है । यही ‘राम राज्य’ है । यानी उसको पूर्ण स्वतंत्रता और किसी तरीके की रोक-टोक नहीं होनी चाहिए ।

ग्राम राज्यों का संघ

गाँधीजी के अनुसार सरकार की शक्ति का केंद्रीयकरण नहीं होना चाहिए । गाँधीजी यह चाहते थे कि जो भी पूरी सत्ता है । उसे एक जगह सिमटकर इकट्ठा नहीं होना चाहिए । उसे ग्राम राज्य में बांट देना चाहिए यानी कि गांव में पंचायतों का राज होना चाहिए ताकि हर जगह हर इलाके की अपनी जिम्मेदारी होगी । हर गांव की अपनी जिम्मेदारी होगी शिक्षा की, स्वास्थ्य की आवास की, पानी की, सुरक्षा की हर गांव की अपनी खुद की जिम्मेदारी होगी । यानी हर गांव के पास शक्ति होनी चाहिए जिससे ग्राम पंचायत हर ग्रामवासियों की सुख सुविधा के लिए आधारभूत सुविधाएं उत्पन्न कर सके ।

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पंचायत राज्यों व्यवस्था का समर्थन

गांधीजी चाहते थे कि हमारे देश में, हमारे राज्य में, पंचायती राज स्थापित होना चाहिए । गांधीजी सरकार के नियंत्रण से मुक्त होना चाहते थे । चाहे वह देसी सरकार हो या विदेशी सरकार हो । यह महत्वपूर्ण है और उसको उन्होंने तीन भागों में बांटा है ।

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पहला है, ग्राम पंचायत

दूसरा मंडल पंचायत और उसके ऊपर

तीसरा जिला पंचायत

इस तरह से गांव के मुखिया का जो चुनाव होगा । वह गांव के लोग ही करेंगे और यह बात पक्की है कि गांव के लोग उसी मुखिया को चुनेंगे, जो गांव में सबसे ज्यादा समझदार होगा और लोगों को जिस पर सबसे ज्यादा विश्वास होगा । इसलिए ग्राम पंचायत में गांधीजी पंचायती राज का समर्थन करते थे । अगर कोई राज्य है तो उसका एक मुख्यमंत्री होता है, तो वह हर जगह तो नहीं जा सकता कि आपको क्या समस्या है, क्या परेशानी है ।

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अगर इसी तरह गांव में पंचायती राज होगा तो मुखिया हर घर में जाकर लोगों की परेशानियां समझ सकता है और उसका समाधान भी आसानी से कर सकता है । तो इसलिए गांधीजी चाहते थे कि हमारे राज्य में पंचायती राज हो, जिससे आमजन की परेशानियों को जल्द से जल्द हल किया जा सके ।

अर्थव्यवस्था : गरीबों का स्वराज

गांधी जी का यह भी मानना था कि “मेरे सपनों का स्वराज, गरीब का स्वराज भी है” । वह चाहते थे कि हर आदमी की मूलभूत आवश्यकता पूरी होनी चाहिए यानी हर इंसान की जो Basic Need है, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और स्वतंत्र घूमना । इन आवश्यकताओं को पूरा करने का सपना गांधी जी का था । सबसे पहले गांधी जी की चाहते थे कि इंसान की मूलभूत ज़रूरतें पूरी होने चाहिए । तभी हमारे देश का विकास हो सकता है । तो इसलिए गांधी जी ने कहा है कि मेरे सपनों का स्वराज तो गरीब का स्वराज ही है । यानी गाँधीजी गरीबों के समानता के पक्ष में थे । तो इसको हम समझते कुछ मुख्य बिंदुओं द्वारा समझते हैं ।

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1 आर्थिक समानता

जैसा कि मैंने आपको पहले बताया कि हर इंसान की आधारभूत आवश्यकता पूरी होनी चाहिए । गांधीजी चाहते थे कि जो भी संपत्ति है, वह कुछ लोगों के हाथों में नहीं होनी चाहिए । उसे बांट देना चाहिए । जैसा पहले बताया कि हर जिले में पंचायती राज होना चाहिए । और इसे तीन इकाइयों में बांटना चाहिए ग्राम पंचायत, मंडल पंचायत और जिला पंचायत । जिला पंचायत के पास संपत्ति हो और वह मध्यम पंचायत और आगे ग्राम पंचायत में उसे बांट दें । हर गांव के मुखिया के पास अगर संपत्ति आ जाए तो वह अपने गांव के सुधार के लिए इस्तेमाल करे, जिससे सभी का सुधार हो सकेगा ।



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अगर जिला पंचायत अपने पास पैसे रखें और परेशानी आए और कई समस्याएं एकत्रित हो जाएं और फिर कोई काम करना हो तो उसमें बहुत समय लग जाएगा । अगर यह समय पर बांट दिया जाए तो काम समय पर हो सकता है और सबका विकास होगा । तो इसलिए गांधी जी चाहते थे कि तो सभी की जरूरत, आवश्यकता है, वह पूरी होनी चाहिए ।

2 शारीरिक श्रम पर बल

गांधीजी यह चाहते थे कि हर व्यक्ति को कुछ ना कुछ शारीरिक श्रम करना चाहिए । कोई कार्य या मेहनत करके अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए यानी हर व्यक्तियों कुछ ना कुछ कार्य अवश्य करना चाहिए । गांधी जी का यह मानना था कि अगर आप भोजन करते हैं बिना किसी काम किए तो वह भोजन चोरी के समान है । इसमें गांधी जी का बहुत अच्छा विचार है, इसलिए गांधी चाहते थे कि हर हर व्यक्ति कुछ ना कुछ शारीरिक श्रम करते रहे । गांधीजी खुद भी कार्य करते थे, वह चरखा चलाते थे । यानी वे चाहते थे कि हर व्यक्ति कुछ काम करें । क्योंकि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता । लेकिन हर व्यक्ति को काम करना चाहिए । जो लोग काम नहीं करते थे, उनको गाँधीजी कहते थे कि आपको जीवन व्यतीत करने के लिए कुछ ना कुछ श्रम करना बहुत आवश्यक है ।

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3 मशीनीकरण का विरोध

गांधी जी ने मशीनीकरण का भी विरोध किया है, क्योंकि इससे क्या होता है, बेरोजगारी को बढ़ावा मिलता है । जहां पहले 100 व्यक्ति काम किया करते थे, अब वहां एक मशीन के द्वारा ही आसानी से काम हो जाता है । इसमें 100 लोगों के बेरोजगार होने का खतरा होता है । इसके बहुत सारे नुकसान भी हैं क्योंकि लोग अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन कर लेते हैं । जिससे चीजों का भी नुकसान होता है और हमारे देश मे बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है । तो इसलिए गांधीजी ने मशीनीकरण का विरोध किया है । मशीनें नहीं होनी चाहिए । लोगों को अगर वह काम करेंगे तो उनका विकास होगा और हमारे देश का भी विकास होगा और बेरोजगारी कम होगी। इसलिए गांधीजी ने मशीनीकरण का बहुत ज्यादा विरोध किया था । अब हम बात करते हैं, अगले महत्वपूर्ण तथ्य है ।

सर्वोदय का सिद्धांत

गांधी जी ने इस पर 3 मुख्य बातें बताई हैं । सबसे पहला है, हर एक व्यक्ति का यह लक्ष्य होना चाहिए कि समाज का तेज विकास हो सके यानी कि सबका एक साथ समाज में विकास हो ।

दूसरी बात यह होनी चाहिए कि अगर वकील का जितना श्रम होता है, उतना ही श्रम एक बाल काटने वाले नाइ का भी होता है । जिस तरीके से वकील कोर्ट में जाकर कोई केस लड़ता है, उस तरीके से नाई भी दुकान पर जाकर बाल काटता है । उसकी भी अपनी एक मेहनत है । यानी काम कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता । इसीलिए गांधी जी ने कहा है कि दोनों को एक समान अधिकार मिलना चाहिए । जितने अधिकार नाई के है, उतने ही अधिकार वकील को देना चाहिए । यानी इन दोनों में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए । और

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तीसरा कहा है कि काम करके जीवन बिताना चाहिए, क्योंकि सबका जीवन है । किसान फसल उगाने के लिए दिन-रात काम करता है, हल चलाता है, मजदूरी करता है । तब जाकर वह समाज में फसल पैदा होती है और लोग उसका उपयोग करते हैं ।

तो यह आज का जो Topic है, जो हमें गाँधीजी के स्वराज पर विचारों को बताता है । यानी कि हमें उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है । जैसे कि गांधीजी ने अहिंसा पर चलकर एक कल्याणकारी राज्य की कल्पना स्थापित की थी और वह चाहते थे कि हमारा समाज अहिंसा वाला हो । उसमें किसी भी तरीके का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए । किसी तरीके का कोई दंगा, फसाद, मारपीट ना हो । वह एक सच्चे व्यक्ति थे ।

गांधी जी के विचार आज भी हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । हम सभी को उनके विचारों पर चलना चाहिए ।

तो दोस्तों यह था आपका गांधी जी के स्वराज पर विचार, अगर आपको ये Post अच्छी लगी तो अपने दोस्तों के सर्च share करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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