Thoughts of B.R. Amberdkar on social justice hindi

सामाजिक न्याय पर बी. आर. अंबेडकर के विचार

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Hello दोस्तों ज्ञानोदय में आपका फिर से स्वागत है । आज हम आपके लिए लेकर आए हैं । ‘सामाजिक न्याय पर अंबेडकर के विचार’ । Thought of B.R. Ambedkar on Social Justice

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भीमराव अंबेडकर को दलित विचारक के रूप में पहचाना जाता है । अंबेडकर ने भारतीय राजनीति, समाज और जाति व्यवस्था का गहराई से अध्ययन किया है । और इन विषयों पर अपने विचार दिए हैं । डॉक्टर अंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे । इसीलिए भारत का संविधान उनके विचारों से प्रभावित हुआ । उनके सामने एक बड़ी समस्या यह थी कि किस तरीके से और कैसा संविधान बनाया जाए । जिसके जरिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना की जा सके । इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने पिछड़ी जाति के आरक्षण का समर्थन किया और भेदभाव को समाप्त करने के लिए संविधान के अंदर काफी सारे प्रावधान दिए । अंबेडकर ने दलितों के साथ में होने वाले भेदभाव का खुद सामना किया क्योंकि वह खुद भी दलित थे । इसके अलावा वह दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को उचित नहीं मानते थे । उनके अनुसार भारतीय समाज के अंदर सुधार होना चाहिए था । ताकि शूद्रों के साथ भेदभाव ना हो सके । अंबेडकर के अनुसार हिंदू समाज के अंदर जो सबसे बड़ी बुराई है । वह है असमानता और भेदभाव क्योंकि ब्राह्मणों ने वेदों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया और खुद को ऊंचा साबित कर दिया और शूद्रों को नीचा साबित कर दिया ।

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अस्पृश्यता का अर्थ

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अंबेडकर ने हमें अस्पृश्यता का मतलब बताया है । उनके अनुसार अस्पृश्यता एक ऐसी स्थिति है जिसमें नीची जाति के लोगों को अपवित्र मानकर उनके साथ भेदभाव किया जाता है । अंबेडकर ने एक किताब लिखी ‘अछूत कौन है ?” जिसमें उन्होंने छुआछूत के उदय के बारे में बताया है और छुआछूत को दूर करने के सुझाव भी दिए हैं । अंबेडकर के अनुसार हिंदू समाज या हिंदू सभ्यता, सभ्यता हीन है क्योंकि हिंदू सभ्यता के अंदर 1 बड़े वर्ग को समाज से अलग रखा जाता है और उसके साथ भेदभाव किया जाता है ।

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जाति प्रथा के दोष

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अंबेडकर ने जाति प्रथा के दोषों के बारे में भी बताया है । क्योंकि जाति प्रथा ही कारण हैं, जिससे शूद्रों को अपमान की जिंदगी जीने पड़ी और अपमान को बर्दाश्त करना पड़ा । इसके कई कारण हैं । जाति प्रथा को जन्म के आधार पर मान्यता दी जाती है । लेकिन यह ठीक नहीं है क्योंकि व्यक्ति किसी परिवार में पैदा हुआ है, इसलिए उसका कोई दोष नहीं है । उसका कोई योगदान नहीं है । जाति प्रथा में एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से विवाह नहीं कर सकते । शूद्रों को ना तो हथियार रखने का अधिकार था और ना ही उन्हें सेना में भर्ती किया जाता था । इसलिए शूद्र अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए ना तो क्रांति कर सकते थे और ना ही संघर्ष कर सकते थे । शूद्रों को ना तो संपत्ति रखने का अधिकार था और ना ही शिक्षा आदि हासिल करने का अधिकार था ।

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जिस से शूद्रों की स्थिति में सुधार नहीं हो पाया और ना ही उनका विकास हो पाया । ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों से कोई भी काम जबरन करवा सकते थे । इसके अलावा समाज के अंदर जितने भी नियम है वह ऊंची जाति के द्वारा बनाए जाते थे । यहां तक कि ऊंची जाति के लोगों के पास अधिकार था कि वह निम्न जाति के लोगों को जान से भी मार सकते थे ।

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इस तरीके से अंबेडकर ने यह बताने की कोशिश की थी कि दलितों के साथ शूद्रों के साथ भेदभाव किया जाता था । उनका शोषण किया जाता था । और दलित अपनी स्थिति में सुधार नहीं ला सकते थे । क्योंकि वह बहुत कमजोर थे । वह कोई क्रांति नहीं कर सकते थे । संघर्ष नहीं कर सकते थे । उनकी संघर्ष करने की इच्छा समाप्त हो चुकी थी ।

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प्रथा की समाप्ति

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अंबेडकर ने हमें बताया कि किस तरीके से जाति प्रथा को या वर्ण व्यवस्था को खत्म किया जा सकता था । सबसे पहले वर्ण व्यवस्था या जाति प्रथा को शास्त्रों से संबंधित नहीं मानना चाहिए । और विभिन्न जातियों की बीच आपसी विवाद संबंधों को बढ़ावा देना चाहिए । जाति को वंश के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर मानना चाहिए । नीची जाति के लोगों को भी सेना में भर्ती करने का अधिकार मिलना चाहिए या उन्हें छूट देनी चाहिए । ताकि उन्हें कि उन्हें भी सेना में भर्ती किया जाए । और सभी जाति के लोगों को एक समान रूप से वोट डालने का और चुनाव लड़ने का अधिकार भी देना चाहिए ।

आरक्षण का समर्थन

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और इस तरीके से अंबेडकर ने निम्न जाति के स्तर में सुधार लाने के लिए आरक्षण का समर्थन किया । क्योंकि उनका मानना था कि हिंदू लोग ऊंची जाति के लोग कभी भी दलितों को स्वीकार नहीं करेंगे । दलितों की स्थिति में तब सुधार आएगा जब उन्हें आरक्षण मिलेगा । इसीलिए अंबेडकर ने आरक्षण का समर्थन किया । तो दोस्तों यह थे बी. आर. अंबेडकर के सामाजिक न्याय पर विचार ।

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