संविधान में अधिकार (Rights in the Indian Constitution) Part 2

Hello दोस्तो, ज्ञान उदय में एक बार आपका फिर स्वागत है। बात करते है, संविधान में अधिकार (Rights in the Indian Constitution) Part 2 । इस चैप्टर के Part 1 को पढ़ने के लिये यहाँ Click करें ।

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Chapter को अच्छे से समझने के लिए इसके Part 1 को ज़रूर पढ़े। अगर आपको इस Chapter या फिर 11th, 12th क्लास के detailed notes चाहिए तो आप हमारे Whatsapp 9999338354 पर Contact कर सकते हैं।

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अब बात करते हैं हम अनुच्छेद 20, 21, 21ए और 22  की

अनुच्छेद 20 अपराधों की सिद्धि के संबंध में संरक्षण (Protection in Respect of Conviction for offences)

अनुच्छेद 20 में बताया गया है कि किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं माना सकता, जब तक उसने उस समय लागू किसी भी कानून का उल्लंघन ना किया हो । किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए एक से ज्यादा बार दंड नहीं दिया जा सकता और ना ही उस पर मुकदमा चलाया जा सकता । किसी भी व्यक्ति को खुद अपने खिलाफ साक्ष्य (सबूत) पेश करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता ।

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अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण (Protection of Life and Personal Liberty)

अनुच्छेद 21 ने बताया गया है कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति से ना तो उसका जीवन छीना जाएगा और ना ही उसकी स्वतंत्रता छीनी जाएगी । परन्तु सरकार कानून बनाकर विधि के जरिए व्यक्ति के जीवन को भी छीन सकती है और उसकी स्वतंत्रता को भी छीन सकती है ।

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21A शिक्षा का मौलिक अधिकार (Right to Education)

संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम 2002 के जरिए एक नया अनुच्छेद 21A जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया । अनुच्छेद 21A में कहा गया है कि राज्य कानून बनाकर 6 साल से लेकर 14 साल तक के सभी बच्चों को निशुल्क या फ्री शिक्षा देगा ।

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अनुच्छेद 22 बंदी करण और गिरफ्तारी से संरक्षण (Protection against arrest and retention in certain cases)

इस अनुच्छेद में गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के अधिकार के बारे में बताया गया है ।

1. किसी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जायगा । दूसरा

2. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपने पसंद का वकील चुनने की पूरी पूरी आजादी दी जाएगी । तीसरा

3. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा । और चौथा

4. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया तो उसे हवालात में बंद नहीं किया जा सकता, उसे फिर छोड़ना पड़ेगा ।

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लेकिन दो लोगों को यह सारी सुविधाएं नहीं मिलती ।

एक तो शत्रु देश के नागरिक को यह सुविधा नहीं मिलती ।

दूसरा अगर किसी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी के तहत गिरफ्तार किया गया है, तो उसे भी यह चारों सुविधाएं नहीं मिलती ।

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निवारक नज़रबंदी किसे कहते हैं ?

अगर किसी व्यक्ति को अपराध होने से पहले गिरफ्तार कर लिया जाता है यानी किसी व्यक्ति पर शक है कि इसको खुला छोड़ने से अपराध होने की संभावना बढ़ सकती है इसलिए उसे अपराध होने से पहले ही पकड़ कर जेल के अंदर डाल दिया जाता है । इसे ही निवारक नजरबंदी कहा जाता है । निवारक नजरबंदी में भी 3 महीने से ज्यादा निवारक नजरबंदी में नहीं रखा जा सकता । 3 महीने के बाद उस व्यक्ति को जिसे निवारक नजरबंदी के तहत गिरफ्तार किया गया, एक सलाहकार बोर्ड के सामने पेश किया जाता है । सलाहकार बोर्ड ही यह फैसला लेता है कि इसे और आगे जेल में रखा जाए या ना रखा जाए ।

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शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right to Exploitation)

अब जानते हैं, शोषण के विरुद्ध अधिकार के बारे में अनुच्छेद 23, 24

अनुच्छेद 23 मानव के क्रय-विक्रय व बेगारी पर प्रतिबंध (Prohibition of trafficking in Human being and Forced Labour)

अनुच्छेद 23 में बताया गया है कि मानव के क्रय विक्रय और बेगारी लेने पर प्रतिबंध है । इसमें साफ-साफ बताया गया है कि किसी भी तरीके से भारत के अंदर बच्चों, पुरुषों को खरीदा और बेचा नहीं जा सकता इसी तरीके से किसी व्यक्ति से बिना पैसे दिए काम नहीं लिया जा सकता । बेगारी नहीं ली जा सकती ।

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अनुच्छेद 24 कारखानों आदि में बालकों के काम पर प्रतिबंध (Prohibition of Employment of Children in Factory Act)

अनुच्छेद 24 में बाल मजदूर में प्रतिबंध अनुच्छेद 24 में कहा गया है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों कारखानों में या फैक्ट्रियों में या किसी भी जोखिम भरी परिस्थितियों में काम नहीं लिया जा सकता ।

इस तरीके से अनुच्छेद 24 के जरिए बाल मजदूरी पर पाबंदी लगाई गई है

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धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion)

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और यहां पर बहुत सारे धर्म पाए जाते हैं धर्म व्यक्ति का निजी मामला है इसलिए भारत में सभी धर्मों को के लोगों को समान अवसर दिए गए हैं और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 26 27 और 28 व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है

अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को मानने और प्रचार करने का अधिकार (Freedom of conscious and free profession practice and propagation in of Religious)

अनुच्छेद 25 में किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार है यानी हम किसी भी मजहब को मान सकते हैं उसका प्रचार कर सकते हैं । यह हमारा मौलिक अधिकार है । लेकिन धर्म को मानने और उसके प्रचार करने का असीमित नहीं है । सरकार धार्मिक बुराइयों को दूर करने धर्म के अंदर हस्तक्षेप करने जैसे कि सरकार ने जाति प्रथा सती प्रथा दहेज प्रथा पर्दा प्रथा और जितने भी बुरी बुरी प्रथाएं हैं उन्हें दूर करने के लिए सरकार ने धर्म के अंदर दखल भी दिया है ।

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अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंधक की स्वतंत्रता (Freedom to manage religious affairs)

अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध करने की स्वतंत्रता हम मंदिर मस्जिद बना सकते हैं । धार्मिक कार्य कर सकते हैं । जलसा कर सकते हैं जागरण कर सकते हैं । यह हमारे मौलिक अधिकार है ।

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अनुच्छेद 27 करो की अदायगी में छूट (Freedom in payment of taxes)

अनुच्छेद 27 में बताया गया है कि करो की अदायगी में छूट धार्मिक कार्यों का प्रबंध करने के लिए जो धन इकट्ठा किया जाएगा जैसे कि दान चढ़ावा या चंदा सरकार उस पर टैक्स नहीं लगाएगी और किसी भी धार्मिक संस्थाओं को जैसे मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा कर देने के लिए टैक्स देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा मजबूर नहीं किया जाएगा ।

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अनुच्छेद 28 सरकारी शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर रोक (Prohibition of Religious Education in Government Educational Institution)

अनुच्छेद 28 में सरकारी शिक्षा शिक्षा संस्थानों पर धार्मिक शिक्षा पर रोक अनुच्छेद 28 में बताया गया है कि राज्य द्वारा या राज्य की सहायता से चलाए जा रहे शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी हां अगर किसी शिक्षण संस्था की स्थापना किसी धर्म संपदा का विकास करने के लिए हुई है तो वहां पर धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है लेकिन ऐसी धार्मिक शिक्षा में या धार्मिक उपासना में किसी को जबरदस्ती उपस्थित नहीं किया जा सकता प्रार्थना में जबरदस्ती नहीं बुलाया जा सकता अगर व्यक्ति वयस्क है तो यह काम उसकी सहमति से होगा अगर वयस्क नहीं है तो यह काम उसकी अभिभावक की सहमति से होगा |

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अनुच्छेद 29 संस्कृति और शिक्षा के अधिकार ( Cultural and Educational Rights)

बात करते हैं हम संस्कृति और शिक्षा के अधिकार की कल्चरल एंड एजुकेशनल राइट्स

अनुच्छेद 29 में बताया जाए कि जितने भी अल्पसंख्यक हैं बल्कि अल्पसंख्यक क्या सभी को अपनी संस्कृति भाषा लिपि को बचाने का अधिकार दिया गया है और राज्य किसी भी धार्मिक संप्रदाय को याद या धार्मिक शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में किसी तरीके का कोई भेदभाव नहीं करेगा |

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अनुच्छेद 30 भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए शिक्षण संस्थाएं खोलने का अधिकार ( Rights of Minority to Enable to Administrator Educational Institute)

अनुच्छेद 30 में बताया गया है कि  हम अपने धर्म भाषा लिपि संस्कृति को बचाने के लिए अपनी शिक्षण संस्था खोल सकते हैं और किसी भी शिक्षण संस्था के अंदर प्रवेश ले सकते हैं और

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अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( Right to Constitutional Remedies)

अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32 में भारतीय संविधान के भाग 3 में छह मौलिक अधिकार दिए गए हैं । इनमें से सबसे महत्वपूर्ण जो मौलिक अधिकार हैं, हमारा वह है संवैधानिक उपचारों का अधिकार ।

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अनुच्छेद 32 इसलिए संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को मौलिक अधिकारों की आत्मा भी कहा जाता है । जिस तरीके से बिना आत्मा के शरीर बेकार शरीर किसी काम का नहीं है अगर शरीर के अंदर से आत्मा निकाल दी जाए तो शरीर बेकार है शरीर से हम कोई काम नहीं ले सकते ठीक उसी तरीके से अगर संवैधानिक उपचारों के अधिकार को निकाल दिया जाए तो मौलिक अधिकारों का कोई महत्व नहीं रह जाता । मौलिक अधिकार बेकार हो जाते हैं ।

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संवैधानिक उपचारों के अधिकार में बताया गया है कि अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार छीन लिए जाऐं तो सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है । न्यायालय हमें हमारे अधिकार दिलाने के लिए पांच लेख जारी करता है जिसमें से सबसे पहला है ।

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1, बंदी प्रत्यक्षीकरण लेख यानी शरीर को हमारे सामने पेश करो |

बंदी प्रत्यक्षीकरण लेख के जरिए न्यायालय गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपने सामने पेश करने का आदेश दे सकता है । अगर न्यायालय पाता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से या उसे बेवजह गिरफ्तार किया गया है तो न्यायालय उसे छोड़ने का भी आदेश दे सकता है ।

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2, परमादेश लेख यानी हम आज्ञा देते हैं |

दूसरा है परमादेश लेख यानी हम आज्ञा देते हैं । परमादेश लेख के जरिए न्यायालय किसी संस्था को अपने कर्तव्यों का पालन करने के आदेश दे सकता है । जैसे कि अगर कोई विश्वविद्यालय अपने किसी 5 विद्यार्थियों को डिग्री ना दे या कोई संस्था अपने कर्मचारियों को बिना कारण बताए नौकरी से निकाल देती है तो न्यायालय आदेश दे सकता है कि अब आप अपने कर्तव्यों का पालन करो इस व्यक्ति को या इस विद्यार्थी को डिग्री दो । उसे नौकरी से क्यों निकाला संस्था से कारण बताओ नोटिस लिया जायेगा ।

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3, प्रतिषेध लेख  यानी मना करना |

अगर सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय पाता है कि अधीनस्थ न्यायालय अपने कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया या कोई ऐसा कार्य कार्य कर रहा है जो उसके अधिकार में नहीं है तो ऐसे में उच्च/सर्वोच्च न्यायालय उसे रोक सकता है । इसे ही कहते हैं प्रतिषेध लेख यानी कि मना करना ।

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4, अधिकार पृच्छा यानी किस अधिकार से |

अगर किसी व्यक्ति ने कोई ऐसा काम किया है जिसका उसे अधिकार नहीं था तो न्यायालय उससे पूछ सकता है कि अधिकार पृच्छा है कि आपने यह काम किस अधिकार से किया जैसे कि सरकारी नौकरी से हटने की जो आज है 60 या 65 साल है । अब कोई व्यक्ति इस उम्र के बाद भी अपनी नौकरी पर बना रहता है या अपने अधिकार का इस्तेमाल गलत करता है तो ऐसे में न्यायालय उससे पूछ सकता है कि आप किस अधिकार से इस पद पर बने हुए हो और न्यायालय उससे जबरदस्ती हटाने का भी आदेश दे सकता है ।

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5, उत्प्रेषण लेख यानी पूर्णत सूचित कीजिए |

अगर न्यायालय को यह लगता है कि यह किसी मुकदमे की सुनवाई अधीनस्थ न्यायालय केंद्र ठीक तरीके से नहीं चल पा रही है याद ठीक तरीके से किसी मुकदमे की सुनवाई नहीं हो रही है तो सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय उच्च न्यायालय से मुकदमा अपने पास ले लेता है और सारे कागज अपने पास मंगा लेता है और कहता है उस प्रेक्षक लेख यानी पूरी तरह सूचित कीजिए अब इस मुकदमे की सुनवाई इस न्यायालय के साथ होगी ।

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इस तरीके से संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है बिना संवैधानिक उपचारों के अधिकारों के बिना तमाम के तमाम अधिकार बेकार है ।

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अब हमने अधिकारों के बारे में तो बात कर ली जरा कर्तव्यों के बारे में भी जान लेते हैं |

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मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)

कर्तव्य ऐसी जिम्मेदारियों को कहते हैं जो एक नागरिक को दूसरे नागरिक के प्रति देशवासियों के प्रति और देश के प्रति निभानी पड़ती है । हर अधिकार के साथ एक कर्तव्य जुड़ा होता है जैसे कि मुझे जीने का अधिकार है तो अब मेरा यह कर्तव्य है मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं दूसरों को भी जीने दूं । किसी दूसरे की जान ना लूँ, अगर मैं अपना कर्तव्य तोड़ता हूं तो किसी दूसरे इंसान का अधिकार छिन सकता हैं । इसलिए कहते हैं “जियो और जीने दो”

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