राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ

Challenges in Nation Building  

Hello दोस्तों ज्ञान उदय में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम आपके लिए लेकर आए हैं, राजनीति विज्ञान में बारहवीं Class का दूसरी किताब (स्वतंत्र भारत में राजनीति) का पहला Chapter जिसका नाम है, “राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां”  challenges of Nation Building.

इस किताब में भी पहली किताब की तरह 9 Chapters दिए गए हैं और इस किताब में ज्यादातर भारत के बारे में बताया गया है । तो चलिए शुरू करते हैं, पहला Chapter राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां ।

स्वतंत्रता के समय की परिस्थितियां

भारत को आजादी बहुत ही मुश्किल हालातों में मिली थी । लगभग 200 सालों की गुलामी के बाद । 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारत आजाद हुआ । पंडित जवाहर लाल नेहरू को आजाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया । हिंदुस्तान के नागरिक इस आजादी का बहुत ही बेसब्री से इंतजार कर रहे थे । आजादी मिली लेकिन देश को बंटवारे का भी सामना करना पड़ा और बंटवारे में जो सबसे ज्यादा मुसीबतें उठानी पड़ी वह अल्पसंख्यकों को उठानी पड़ी । जैसे ही बंटवारे की घोषणा हुई, अल्पसंख्यकों पर हमले शुरू हो गए । लोगों को मारा जाने लगा, बहन-बेटियों की इज्जत लूटी गई और बहुत सारे लोगों ने अपने घर की इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों से अपनी बहू-बेटियों को मौत के घाट उतार दिया । बटवारा इतना खतरनाक था कि जो लोग बंटवारे में अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे, उन्हें भी आखिरकार मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा । यह चीजें कहना और सुनना बहुत आसान है । लेकिन जिन लोगों ने इस तरह की परेशानियों का सामना किया है, वही जान सकते हैं कि इस तरीके के कितने बुरे हालात थे । इसलिए 1947 को हिंसा और विस्थापन की त्रासदी का साल माना जाता है ।

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आज़ाद भारत की तीन प्रमुख चुनौतियां

जब भारत को आजादी मिली थी, तो आजादी के तुरंत बाद हमारे देश भारत को तीन बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा । जिसमें पहली चुनौती थी ।

1 एकता व अखंडता की चुनौती

भारत में आजादी और बंटवारे के बाद सबसे बड़ी और सबसे पहली चुनौती एकता और अखंडता की चुनौती थी । क्योंकि भारत में बहुत सारे धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोग रहते हैं । इनके बीच एकता और अखंडता बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था । धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर देश के बंटवारे की मांग पैदा होने लगी । इसलिए यह चुनौती अभी भी बनी हुई थी ।

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2 लोकतंत्र की स्थापना की चुनौती

दूसरी चुनौती थी । लोकतंत्र को कैसे स्थापित किया जाए, क्योंकि भारत में लोगों को लोकतंत्र का मतलब ही नहीं पता था कि लोकतंत्र आखिर कहते किसे हैं ? घर-घर जाकर लोगों को लोकतंत्र का मतलब समझाना था । क्योंकि लोग तो राजा महाराजाओं को ही अपना सब कुछ मानते थे । ऐसे में लोगों को लोकतंत्र का मतलब समझाना बहुत मुश्किल था । मतदाता सूची बनानी थी । चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन भी करना था और इस तरीके से लंबी तैयारी के बाद पहले चुनाव सन 1952 में हुए । इसलिए चुनाव करवाना और लोकतंत्र अपनाना किसी चुनौती से कम नहीं था ।

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3 विकास की चुनौती

तीसरी चुनौती थी विकास करने की चुनौती । अंग्रेजी शासन की वजह से भारत बहुत ज्यादा पिछड़ गया था । अब हमें तेजी से तरक्की करके आगे बढ़ना था । तरक्की करने या फिर विकास करने के दो रास्ते थे । एक तो

अमेरिका का पूंजीवाद वाला रास्ता था और दूसरा

सोवियत संघ का समाजवादी वाला रास्ता था ।

अब विकास करने के लिए कौन से रास्ते पर चलें ? अमेरिका के पूंजीवादी रास्ते को अपनाया जाए या फिर सोवियत संघ के समाजवादी रास्ते को अपनाया जाए । तो विकास को लेकर यह विवाद पैदा हो गया कि भारत के विकास के लिए आखिर किस रास्ते को अपनाया जाए । लंबे वाद विवाद के बाद भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया और आर्थिक नियोजन को अपनाया गया ।

इस तरह भारत को इन चुनौतियों का सामना करना पड़ा । आजादी के तुरंत बाद बंटवारा भी हुआ ।

विभाजन की प्रक्रिया

आजादी के बाद जो बंटवारा हुआ, वह बहुत ही खतरनाक था । बहुत मुश्किल था, क्योंकि बटवारा धर्म के आधार पर किया गया था और यह तय किया गया कि ब्रिटिश इंडिया में, पूरे भारत को हम ब्रिटिश इंडिया ही कहते थे । भारत के कुछ हिस्सों पर अंग्रेजो का कब्जा था और कुछ हिस्सों पर राजा महाराजा राज करते थे । तो जिस हिस्से पर ब्रिटिश का कब्जा था, उस हिस्से को हम ब्रिटिश इंडिया कहते थे और जिस हिस्से पर राजा महाराजाओं का कब्जा था, उसे देशी रियासत कहते थे । इस तरीके से भारत का बंटवारा बहुत ही मुश्किल हो गया, क्योंकि बटवारा धर्म के आधार पर किया गया था और यह तय किया गया कि ब्रिटिश इंडिया में जहां पर मुसलमान ज्यादा है, वहां पर पाकिस्तान बना दिया जाएगा और बाकी बचे हुए हिस्से को हिंदुस्तान बना दिया जाएगा । इस तरीके से भारत का बंटवारा किया गया । ब्रिटिश इंडिया के बंटवारे के बाद रियासतों की समस्या पैदा हुई कि रियासतों के साथ आखिर क्या किया जाएगा और यह फैसला रियासतों के शासकों पर छोड़ दिया और अब हर शासक के सामने तीन रास्ते थे ।

अ : भारत में विलय यानी भारत में मिल जाना । दूसरा

ब : पाकिस्तान में विलय यानी पाकिस्तान में मिल जाना और तीसरा

स : आजाद रहने का विकल्प था यानी ना पाकिस्तान में विलय और नहीं हिंदुस्तान में ।

विभाजन से जुड़ी समस्याएं

इस तरीके से भारत का बटवारा हुआ । बटवारे के साथ-साथ बहुत सारी समस्याएं पैदा हुई, क्योंकि ऐसा कोई स्थान नहीं था जहां पर मुसलमान की संख्या ज्यादा हो, बल्कि ऐसे दो क्षेत्र थे । एक पूर्व में था तो दूसरा पश्चिम में था । इसलिए दो पाकिस्तान बनाने पड़े । बहुत सारे मुस्लिम क्षेत्र बंटवारे के खिलाफ थे । इसके अलावा बहुत सारे मुस्लिम नेता भी नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान का निर्माण हो । जैसे कि पश्चिमी उत्तरी सीमा प्रान्त के नेता खान अब्दुल गफ्फार खान बंटवारे के खिलाफ थे । लेकिन फिर भी इस इलाके को पाकिस्तान के अंदर शामिल कर दिया गया । मुस्लिम जनसंख्या क्षेत्र के अंदर भी बहुत सारे गैर मुस्लिम लोग हैं । तो समस्या पैदा हुई थी उन लोगों का क्या करें ? फिर यह सोचा गया कि जिले स्तर पर और गांव स्तर पर बंटवारे किया जाए और यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही । इसमें 1947 के अंत तक बहुत सारे लोगों को यह भी नहीं मालूम था कि वह हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में । जहां जहां मुसलमान हैं, अगर वहीं पाकिस्तान बना दिया जाता तो इस हिसाब से कई पाकिस्तान जाते ।

शरणार्थियों की समस्या

बंटवारे के कारण शरणार्थियों की समस्या पैदा हो गई । बहुत सारे लोगों का आवागमन हुआ । बहुत सारे लोग पाकिस्तान से भारत में आए और बहुत सारे लोग भारत से पाकिस्तान भी गए । अब इन लोगों को दोबारा से घर बनाना था । इनके लिए रोजगार पैदा करना था और यह काम किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था । बंटवारे के कारण बड़े स्तर पर सांप्रदायिक दंगे पैदा हुए। जिसमें बहुत सारे लोग मारे गए और शरणार्थियों की वजह से भारत की एकता अखंडता के लिए भी खतरा पैदा हो गया । इस तरीके से बटवारा करना बहुत मुश्किल है । बटवारा हर चीज कब हुआ था ।

रियासतों के विलय की समस्या

ब्रिटिश इंडिया के बंटवारे के बाद रियासतों की समस्या पैदा हुई । उस वक्त भारत के अंदर लगभग 565 रजवाड़े या देशी रियासतें थी । और इन रियासतों के सामने तीन रास्ते थे । भारत में विलय, पाकिस्तान में विलय या फिर आजाद रहने का विकल्प । ऐसे में यह खतरा पैदा हो गया कि अगर सभी रियासतों ने आज़ाद होने की घोषणा कर दी तो, इससे भारत की एकता अखंडता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा और जिस बात का डर था, वही हुआ । ज्यादातर रियासतों ने आजाद रहने की घोषणा कर दी सबसे पहले हैदराबाद, त्रावणकोर, जूनागढ़, मणिपुर इस तरीके से और भी रियासतों ने आजादी की घोषणा कर दी । जिससे भारत की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो गया ।

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भारत सरकार का दृष्टिकोण

भारतीय नेता रियासतों को हर हाल में भारत में मिलाना चाहते थे, पर पाकिस्तान चाहता था कि रियासतों का विलय भारत में ना हो । ऐसे में भारतीय नेताओं ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई और ज्यादातर रियासतों को भारत में शामिल होने के लिए तैयार भी कर लिया । रियासतों के विलय को लेकर तीन बातें बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है ।

1 रियासतों के जो शासक थे, वह भारत में विलय नहीं होना चाहते थे, रियासतों की जनता भारत में मिलना चाहती थी । क्योंकि अगर रियासतों के शासक भारत में शामिल होने का फैसला लेते तो उन्हें अपना राजपाट छोड़ना पड़ता ।

2 सरकार ने रियासतों को भारत में मिलाने के लिए लचीला दृष्टिकोण अपनाया और बहुत सारे शासकों को स्वायत्तता दी गई । मुआवजा दिया पेंशन दिया ।

3 सरकार हर हाल में रियासतों को भारत में मिलाना चाहती थी ताकि भारत बड़ा और शक्तिशाली बन सके ।

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वर्तमान समय में हमारा भारत क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत बड़ा है । अगर भारत के 565 टुकड़े कर दिए जाते तो हमारा भारत छोटा सा रह जाता । आज हमारा भारत इस वजह से इतना बड़ा है कि सभी रियासतों को भारत के अंदर शामिल कर लिया गया । हमारा भारत आज बहुत बड़ा और बहुत शक्तिशाली है । इस तरीके से रियासतों को भारत में मिलाने के लिए सरकार ने हर तरीका अपनाया । हर तरीके के साम, दाम, दंड, भेद । कुछ रियासतों को प्यार से । रियासतों को शक्ति के साथ मिलाया गया । इस चीज को हम हैदराबाद और मणिपुर की कहानी से आसानी से समझ सकते हैं ।

हैदराबाद

हैदराबाद उस समय की बहुत बड़ी और धनी रियासत थी । हैदराबाद के शासक को निज़ाम कहते थे और निजाम हैदराबाद का राजा बनकर रखना चाहता था । लेकिन भारतीय नेता चाहते थे कि हैदराबाद को भारत में विलय किया जाए । ऐसे में नवंबर 1947 में हैदराबाद के निजाम और भारत सरकार के बीच यथा स्थिति बनाए रखने का समझौता हुआ । यानी अगर निजाम हैदराबाद को भारत में विलय नहीं होना देना चाहता, तो पाकिस्तान में भी नहीं मिलेंगे । यानी यही स्थिति बनाए रखे ताकि बातचीत को आगे बढ़ाया जा सके । भारत सरकार भी ऐसा मौका ढूंढ रही थी कि जिससे हैदराबाद को किसी भी तरीके से भारत में मिलाया जा सके । अब हैदराबाद की जनता ने निजाम के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया । निजाम ने इस आंदोलन को सैनिक शक्ति के जरिए दबाया । अब भारतीय सरकार को मौका मिला । इसलिए सितंबर 1948 में भारतीय सेनाओं को हैदराबाद भेजा गया, ताकि हैदराबाद की जनता को निजाम के अत्याचारों से बचाया जा सके । इस तरीके से निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया और हैदराबाद को भारत के अंदर मिला लिया गया । निजाम प्यार से शामिल नहीं हुआ । निजाम को दूसरा तरीके से भारत में शामिल किया गया ।

मणिपुर

ददूसरी रियासतों की तरह मणिपुर का विलय भी भारत में हुआ । मणिपुर के राजा बोधचंद्र सिंह ने जिले की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए और फिर भारत सरकार ने मणिपुर को स्वयत्तता दे दी । लेकिन मणिपुर की जनता ने लोकतंत्र के लिए आंदोलन चलाया । इसलिए 8 जून 1948 में विधानसभा के चुनाव करवाएं । जिससे मणिपुर के अंदर विधानसभा बन गई । अब भारत सरकार को यह डर था कि मणिपुर की विधानसभा में विलय के खिलाफ प्रस्ताव पास हो सकता है और अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता तो, मणिपुर भारत से अलग हो जाता और एक नया देश बन जाता । अब भारतीय नेताओं को यह डर था कि कहीं विलय के खिलाफ प्रस्ताव ना हो जाए । इसलिए भारत सरकार ने मणिपुर राजा बोधचंद्र सिंह को पूरी तरीके से विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवा लीए । और इससे मणिपुर की जनता भड़क गई, क्योंकि मणिपुर की जनता का मानना था कि अगर विलय के बारे में कोई फैसला लेना था, तो मणिपुर की विधानसभा में होना चाहिए था । मणिपुर की जनता यह फैसला लेती । राजा तो अपना पद छोड़ चुका है । राजा को तो हक़ ही नहीं है कि इस तरीके से फैसला ले । इसलिए मणिपुर की जनता आज भी भारत सरकार के खिलाफ है । उनका यह कहना है कि हमें जबरदस्ती भारत के अंदर मिलाया गया है ।

राज्यों के पुनर्गठन की समस्या

इस तरह से काफी सारी रियासतों को, हर तरीके से भारत के अंदर मिलाया गया । अब भारत में राज्यों के बनाने और सीमांकन की समस्या पैदा हुई और अंग्रेजों ने जितने भी राज्य बनाए थे । वह अपनी सुविधा के अनुसार बनाए थे । पर भारत की जनता अंग्रेजों के जरिए बनाए गए राज्यों से संतुष्ट और सहमत नहीं थी । भारत की जनता तो भाषा के हिसाब से राज्य बनाना चाहती थी । क्योंकि 1920 में कांग्रेस में यह घोषणा पहले से ही कर दी थी कि अगर भारत को आजादी मिलती है, और कांग्रेस की सरकार बनती है, तो हम भाषा के हिसाब से राज्य बनाएंगे । 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया । और कांग्रेस की सरकार भी बन गई । लोगों ने कहा कि आप अपने वादों को पूरा करो । आप की सरकार है और आजादी मिल गई है । तो अब भाषा के आधार पर राज्य बनाए जाए । लेकिन सरकार नहीं चाहती थी कि भाषा के आधार पर राज्य बनाए जाएं । क्योंकि अगर भाषा के आधार राज्य बनाए जाते, तो इससे भाषाई विवाद पैदा हो जाता ।

परंतु मजबूरी में इंसान को कुछ भी करना पड़ सकता है और सरकार के सामने भी ऐसी मजबूरी पैदा हुई थी । सरकार को मजबूरी में भाषा के नाम पर राज्य बनाने पड़े और इस मजबूरी की शुरुआत दक्षिण भारत में तेलुगु भाषा वाले लोगों ने सबसे पहले अलग राज्य की मांग की और तेलुगु भाषा वाले लोग आंध्र प्रदेश के नाम से अपना एक राज्य बनाना चाहते थे और दक्षिण भारत में कांग्रेसी नेता श्री रामलू अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए । और जब तक मांग पूरी नहीं होती । तब तक भूख हड़ताल पर बैठ रहे । 56 दिन की भूख हड़ताल के बाद उनकी मौत हो गई और इससे हालात बहुत खराब हो गए और आखिरकार सरकार को मजबूरी में 1952 में आंध्र प्रदेश के नाम से राज्य बनाना पड़ा ।

तो भाषा के आधार पर जो सबसे पहला राज्य बना । आंध्र प्रदेश के नाम से एक राज्य बन गया । तो आंदोलन और तेज हो गया । गुजराती भाषा बोलने वाले लोग कहने लगे कि गुजरात बनाओ । मराठी भाषा बोलने वाले लोग कहने लगे कि महाराष्ट्र बनाओ । इस तरीके से भाषाई आंदोलन तेज होने लगे ।

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तो दोस्तों ये था राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ, अगर Post अच्छी लगी तो अपने दोस्तों के साथ Share करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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