मौलिक अधिकार Fundamental Rights

Hello दोस्तो ज्ञानोदय आपका स्वागत है, आज हम बात करते हैं मौलिक अधिकार यानी कि Fundamental Rights के बारे में l  

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साधारण शब्दों में कहे तो हर व्यक्ति को अपना विकास करने और आगे बढ़ने के लिए कुछ अधिकारों की आवश्यकता होती है । जिनका इस्तेमाल करके कोई व्यक्ति सफलता की ओर आगे बढ़ता है। इन अधिकारों को मौलिक अधिकार कहा जाता है यानी ज़रूरी अधिकार ।

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मौलिक अधिकार किसे कहते हैं ?

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ऐसे अधिकार जिन अधिकारों के बिना कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता ऐसे अधिकारों को मौलिक अधिकार कहा जाता है । जैसे बिना खाने के इंसान का पेट नहीं भर सकता । अगर एक इंसान के हाथ पैर बांध दिए जाएं तो वह चल फिर नहीं सकता । दौड़ नहीं सकता ।

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ठीक उसी तरीके से जब तक किसी इंसान को अधिकार नहीं दिए जाएंगे । वह इंसान अपनी तरक्की नहीं कर सकता । अधिकार कई तरीके के होते हैं । और जो सबसे ज्यादा जरूरी अधिकार हैं । वह Fundamental Rights है यानी मौलिक अधिकार तो

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“ऐसे अधिकार जिनके बिना कोई व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता तरक्की नहीं कर सकता और इन अधिकारों को ही मौलिक अधिकार कहा जाता है ।”

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भारतीय संविधान के भाग 3 में 6 तरीके के मौलिक अधिकार दिए गए हैं ।

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1 समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18 तक

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2 स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 से 22 तक

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3 शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 और 24

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4 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 25 से 28 तक

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5 शिक्षा और संस्कृति का अधिकार अनुच्छेद 29 और 30 और

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6 संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32 यह अधिकार बहुत महत्वपूर्ण है ।

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सब से पहले हम बात करते हैं, समानता के अधिकार की । भारतीय संविधान के अंदर अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 18 में समानता का अधिकार दिया गया है ।

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अनुच्छेद 14 में बताया गया है कि कानून के समक्ष समानता, यानी सभी लोग कानून की नजरों में बराबर हैं ।

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अनुच्छेद 15 में बताया गया है । भेदभाव की मनाही यानि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या संपत्ति के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा ।

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अनुच्छेद 16 में बताया गया है कि सरकारी नौकरी में सभी को अवसर की समानता यानी सभी लोगों को सरकारी नौकरी पाने का अधिकार दिया जाएगा, मौका दिया जाएगा ।

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अनुच्छेद 17 में बताया गया है कि अस्पर्शयता प्रथा का अंत यानी छुआछूत को किसी भी रूप में बरतने की मनाही दी गई है । अगर कोई व्यक्ति तीन बार से ज्यादा छुआछूत करता है तो उस पर ₹2000 का जुर्माना लगाया जा सकता है या 1 साल की सजा भी हो सकती है । और

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अनुच्छेद 18 में बताया गया है, उपाधियों का अंत । सरकार शिक्षा, कला, सेना, इन क्षेत्रों को छोड़कर किसी और क्षेत्र में उपाधि प्रदान नहीं करेगी ।

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अब हम बात करते हैं । स्वतंत्रता के अधिकार की । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में 6 तरीके के स्वतंत्रता दी गई हैं ।

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पहली है “भाषा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”

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दूसरी है “बिना हथियार के अभाव करने की स्वतंत्रता”

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तीसरा “समुदाय बनाने की स्वतंत्रता”

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चौथा है “भ्रमण की स्वतंत्रता”

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पांचवा है “आवास की स्वतंत्रता” और

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छटा है “जीविका की स्वतंत्रता”

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हालांकि अनुच्छेद 19 में 6 तरीके की स्वतंत्रता दी गई है । लेकिन इन स्वतंत्रताओं पर कहीं ना कहीं किसी न किसी तरीके से पाबंदी लगाई गई है । जैसे भारतीय नागरिकों को भाषण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिला हुआ है । हम बोल कर, लिख कर, फिल्म, टीवी या रेडियो के जरिए अपने विचारों को दूसरे के सामने रख सकते हैं । लेकिन अगर हमारे विचारों या हमारे भाषण से देश की एकता, अखंडता खतरे में पड़ती है । या कोई अव्यवस्था या समस्या पैदा होती है तो ऐसे में हमारे भाषण पर पाबंदी लगाई जा सकती है ।

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इसी तरीके से ऊपर बताई गई सभी स्वतंत्रतायें पर किसी ना किसी तरीके से एकता, अखंडता और नैतिकता को ध्यान में रखते हुए पाबंदी लगाई जा सकती है ।

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अब हम बात करते हैं, अनुच्छेद 20, 21, 21A और 22 की ।

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अनुच्छेद 20 में बताया गया है, अपराधों की सिद्धि के सम्बंध में संरक्षण । अनुच्छेद 20 में लिखा गया है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता । जब तक कि उसने किसी कानून का उल्लंघन ना किया हो । यानी किसी कानून को ना थोड़ा हो । और गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कानून के मुताबिक ही सजा दी जाएगी । इसी को विधि का शासन Rule of Laws भी कहते हैं ।

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दूसरा है अनुच्छेद 21 इस अनुच्छेद में बताया गया है ‘जीवन और दैहिक स्वतंत्रता’ । किसी भी व्यक्ति से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा ना तो उसका जीवन छीना जा सकता है । ना ही उसकी स्वतंत्रता छीनी जा सकती है । आमतौर पर यह माना जाता है कि सरकार कानून बनाकर किसी की आजादी छीन सकती है या किसी की जिंदगी छीन सकती है ।

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जैसे सरकार ने कानून बना दिया कि खून करने पर फांसी है तो सरकार ने हमारी जिंदगी छीन ली या सरकार ने कानून बना दिया चोरी करने पर जेल के अंदर डाल दिया जाएगा तो सरकार ने हमारी आजादी छीन ली । तो सरकार किसी भी मुद्दे पर कानून बनाकर इंसान की जिंदगी छीन सकती है या आजादी छीन सकती है ।कानून बनाकर जिंदगी और आजादी छीनने का सरकार के पास हक है ।

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अनुच्छेद 21a के अंदर हम बात करते “शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के दर्जे की” संविधान के 86 वें संशोधन के जरिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया । अब राज्य सरकार 14 साल तक के सभी बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करेगी ।

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अनुच्छेद 22 के द्वारा “गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के अधिकारों” के बारे में बताया गया है । अनुच्छेद 22 में बताया गया है कि किसी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता । और गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा । गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपना मनपसंद वकील करने की पूरी पूरी आजादी दी जाएगी । और अगर गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया तो उसे छोड़ना पड़ेगा ।

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लेकिन 2 लोगों को यह सारी सुविधाएं नहीं मिलती

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एक अगर गिरफ्तार किया गया व्यक्ति शत्रु देश का नागरिक है । तो उसे यह सुविधा नहीं मिलेगी । और

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दूसरा अगर किसी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी के तहत गिरफ्तार किया गया है । तो उस व्यक्ति को भी यह सुविधा नहीं मिलेगी ।

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निवारक नजरबंदी का मतलब होता है । किसी व्यक्ति को शक के आधार पर पहले से ही गिरफ्तार कर लिया जाता है । यह सोचा जाता है कि अगर इस व्यक्ति को खुला छोड़ दिया जाएगा तो अपराध होने की संभावना बढ़ सकती है । इसलिए उस व्यक्ति को पहले से ही गिरफ्तार कर लिया जाता है । निवारक नजरबंदी के अंदर गिरफ्तार किए गैंव्यक्ति पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता । क्योंकि उसने कोई अपराध किया ही नहीं बल्कि उसे अपराध करने से पहले ही जेल के अंदर डाल दिया जाता है । निवारक नजरबंदी में व्यक्तियों को अधिकार दिए गए हैं ।

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अब हम बात करते हैं “शोषण के विरुद्ध अधिकारों के बारे में” अनुच्छेद 23 के अंदर बताया गया है कि मानव के क्रय-विक्रय पर पाबंदी है । अनुच्छेद 23 के अंदर साफ-साफ लिखा गया है कि किसी भी रूप में स्त्री, पुरुषों, बच्चों और बूढ़ो को खरीदना और बेचना बहुत बड़ा अपराध है । और

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अनुच्छेद 24 में बताया गया है कि “बाल मजदूरी पर पाबंदी” यानी कि किसी भी 14 साल तक के बच्चे को काम पर नहीं रखा जा सकता । किसी जोखिम भरी परिस्थितियों में नहीं लगाया जा सकता ।

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अब हम बात करते हैं, अनुच्छेद 25, 26 और 27 की । इसमें धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बारे में बताया गया है ।

अनुच्छेद 25 में बताया गया है । “किसी भी धर्म को मानने उसके प्रचार करने का अधिकार” । किसी भी व्यक्ति को अपने अनुसार किसी को मानने और उस धर्म के प्रचार करने का अधिकार है ।  

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अनुच्छेद 27 में बताया गया है कि “धार्मिक कार्यों पर कर से छूट का अधिकार” धार्मिक कार्यों से जो धन इकट्ठा किया जाता है । उस पर करो की अदायगी में छूट दी जाएगी । और

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अनुच्छेद 28 में बताया गया है कि “धार्मिक शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार” इस अनुछेद में व्यक्ति को धर्म से संबंधित शिक्षा देने के लिए शिक्षण संस्थायें खोलने का अधिकार है ।

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अनुच्छेद 29 और 30 में शिक्षा और संस्कृति का मौलिक अधिकार दिया गया है । हर किसी को अपनी शिक्षा और संस्कृति को बचाने का अधिकार है । इसी वजह से बहुत सारे लोग अपनी धार्मिक शिक्षण संस्थाएं खोलते हैं । अपनी संस्कृति को बचाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है ।

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और सबसे महत्वपूर्ण है संवैधानिक उपचारों का अधिकार । अनुच्छेद 32 “संवैधानिक उपचारों का अधिकार” इसी वजह से संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को मौलिक अधिकार की आत्मा भी कहा जाता है । यानी अगर संवैधानिक उपचार नहीं है तो सभी अधिकार बेकार हैं । और इन अधिकारों का महत्व सबसे ज़्यादा है ।इसको इस तरह से समझ जा सकता है । जैसे एक इंसान का शरीर होता है । शरीर में बहुत सारे अंग होते हैं हाथ-पैर आंख, नाक, कान और हर अंग का अपना काम होता है । हमारा शरीर चार चीजों से मिलकर बना है । खून, हड्डी, मांस और आत्मा अगर हम अपना हाथ या पैर काटते हैं तो खून निकलता है, हड्डी दिखती है, मांस भी दिखता है । एक चीज और होती है जो नहीं दिखती । और वह शरीर के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी है । वह आत्मा है यानी रूह । अगर शरीर में आत्मा नहीं होगी तो हमारा शरीर बेकार होगा । ठीक इसी तरीके से संवैधानिक उपचारों का अधिकार मौलिक अधिकारों की आत्मा है । जब तक संवैधानिक उपचारों का अधिकार नहीं दिया जाएगा तो तमाम अधिकार बेकार हैं । संवैधानिक उपचारों के अधिकारों के अंदर बताया गया है कि अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार छीन लिये जाएं तो सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है । न्यायालय उस व्यक्ति को उसके अधिकार दिलाने के लिए कई तरीके के लेख जारी करता है ।

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