भारत में स्वतंत्रता के बाद की समस्याएं

Problems in India just after Independence in hindi

Hello दोस्तों ज्ञानउदय में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम बात करते हैं, राजनीति विज्ञान में उन समस्याओं के बारे में जो भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उतपन्न हुई । स्वतंत्रता के बाद भारत में बहुत सारी समस्याएं पैदा हुई । जैसे राजनीतिक समस्याएं जिसमें विभाजन की समस्या और शरणार्थी की समस्या एकता और अखंडता की समस्या, रियासतों की समस्या, कश्मीर की समस्या आदि । इसके अलावा बहुत सारी सामाजिक और आर्थिक समस्याएं शामिल है । आइए इनको विस्तार से जानते हैं ।

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था अंग्रेजी शासन से अत्यधिक प्रभावित थी । बहुत सारे आंदोलनों, संघर्षों और विवादों के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली और इसके साथ ही भारत का बंटवारा भी हुआ ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत लंबे समय तक अंग्रेजों के गुलाम रहने के कारण अनेक समस्याओं से ग्रसित हो गया था । इन सभी समस्याओं का उदय वास्तव में अंग्रेजी शासन काल में हुआ था । लेकिन अंग्रेजी सरकार इन समस्याओं के प्रति उदासीन थी । जिसके कारण यह समस्याएं लगातार बढ़ती रही और आजादी के बाद यह समस्याएं भयंकर रूप में प्रकट हुई । इनमें से प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं-

A) राजनीतिक समस्याएं

सबसे पहले हम बात करेंगे, राजनीतिक समस्याओं की क्योंकि स्वतंत्रता के बाद भारत में राजनीतिक दृष्टिकोण से सबकुछ बिखरा हुआ था । एक नए सिरे से भारत में सरकार का गठन करना था और पूरे देश में अव्यवस्था को व्यवस्थित करना और कुशल रूप से संचालित करना था । राजनीतिक समस्याएं निम्न प्रकार है ।

1) विभाजन और शरणार्थियों की समस्याएं

भारत में विभाजन के समय हिंदू और मुसलमान में भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए तथा इन दंगों के प्रभाव में आकर लाखों लोगों की मृत्यु हुई । ऐसे में जिन्ना ने माना कि हिंदू और मुसलमानों को अलग अलग देशों में स्थानांतरित कर देना चाहिए । जिससे दोनों देशों की हिंसा से मुक्ति मिल जाएगी । परंतु भारतीय नेताओं विशेषकर गांधी जी ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया । क्योंकि हिंदू और मुसलमानों के दंगे प्रतिदिन बढ़ते गए और इन दंगों में बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे मारे गए ।

विभाजन के कारण भारत में बड़े पैमाने पर पाकिस्तान से हिंदू शरणार्थी आए । ऐसा लग रहा था, जैसे हिंदू शरणार्थियों की बाढ़ आ गई हो । दोनों देशों को शरणार्थियों की समस्या का सामना करना पड़ा था । शरणार्थियों की रेलगाड़ियों और दलों पर आक्रमण किए गए । फिर भी दिल्ली में शरणार्थियों की भरमार हो गई । फिर इस तरह से सरकार के सामने इन शरणार्थियों का विस्थापन करना एक चुनौती बन गया था ।

पाकिस्तान का निर्माण धर्म और घृणा के आधार पर हुआ था । इसलिए दोनों वर्गों के बीच हिंसा और घृणा पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई थी । पाकिस्तान ने प्रारंभ से ही भारत विरोधी नीतियों को अपनाया । जिसके कारण उस समय में हिंदू समाज मुस्लिम वर्ग को शंका की दृष्टि से देखता था । इस तरह पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न की गई घृणा भारत के लिए एक बहुत बड़ी और गंभीर समस्या है ।

2) एकता और अखंडता की समस्या

भारत को स्वतंत्र करते समय अंग्रेजों ने केवल भारत को ही स्वतंत्र नहीं किया, बल्कि सभी रियासतों को भी आजाद कर दिया । जिसके कारण भारत की एकता को खतरा उत्पन्न हो गया । क्योंकि अधिकतर देसी रियासतों के नरेश यानी राजा भारत और पाकिस्तान किसी में भी शामिल नहीं होना चाहते थे । वह अपनी अलग रियासत रखना चाहते थे । इस तरह रियासतों की समस्याओं को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है ।

(i) देसी राज्यों की समस्याएं

भारत की एकता के मार्ग में सबसे बड़ी समस्या बहुत सारे ऐसे देसी राज्य थे, जो 15 अगस्त 1947 को भारत के साथ स्वतंत्र हुए थे । जिससे इन राज्यों को यह छूट मिल गई कि वह पाकिस्तान में मिले या फिर भारत में या फिर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें । ऐसी अवस्था में यदि यह सभी राज्य अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर देते तो, भारत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता । अतः इन राज्यों को जोड़कर भारत का निर्माण करना एक बहुत बड़ी समस्या थी ।

(ii) कश्मीर की समस्याएं

3 जून को घोषणा के बाद जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह धर्म संकट में फंस गए । वह जानते थे कि जम्मू कश्मीर का पाकिस्तान में विलय करना भारत के साथ विश्वासघात होगा, क्योंकि इससे पाकिस्तान और भी अधिक शक्तिशाली बन जाएगा । हरि सिंह के सामने कश्मीर का भारत में विलय करने में कश्मीर के मुसलमान सबसे बड़ी बाधा थी और दूसरी ओर लॉर्ड माउंटबेटन के द्वारा हरिसिंह पर दबाव डाला जा रहा था कि वे पाकिस्तान में कश्मीर का विलय कर दें ।

17 अक्टूबर 1947 को विलय संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए इन्हें तैयार कर लिया गया । जैसे ही भारत को पता चला तो, पाकिस्तान ने 24 अक्टूबर को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया । परंतु भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया । नेहरू द्वारा युद्धविराम की घोषणा कर दी गई और लगभग एक तिहाई कश्मीर 13000 वर्ग किलोमीटर पाकिस्तान के कब्जे में ही रह गया और जो आज भी पाकिस्तान के नियंत्रण में है । इसी कारण दोनों देशों का सीमा विवाद आज तक हल नहीं हो सका ।

(iii) हैदराबाद भोपाल व जूनागढ़ की समस्याएं

कश्मीर की तरह ही हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ़ की भी बहुत सारी समस्याएं थी । जिस को हल करने के लिए सरकार को बड़ी सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा । हैदराबाद, भोपाल व जूनागढ़ प्रमुख देसी राज्य थे । जिनके शासक भारत में विलय के विरुद्ध थे । परंतु सरदार पटेल ने उन्हें समझाया और अंततः वह भारत में शामिल हो गए ।

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3) पाकिस्तानी प्रचार और भारतीय मुस्लिम समाज

पाकिस्तान का निर्माण इस सिद्धांत पर हुआ था कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग हैं । अतः यह साथ साथ नहीं रह सकते । पाकिस्तानी शासकों को ऐसा लगा कि यदि भारतीय मुसलमान संतुष्ट हो गए तो भारत एक शक्तिशाली देश बन जाएगा । जो पाकिस्तान के लिए ठीक नहीं होगा । अतः विभाजन के बाद पाकिस्तान ने ऐसी नीतियां अपनाई की भारत में रहने वाले हिंदू और मुसलमानों के बीच घृणा उत्पन्न हो गई । स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले यह नफरत इतनी अधिक थी कि इसके कारण भारतीय शासन व्यवस्था का संचालन करना लगभग असंभव हो गया था ।

4)  विदेशी राजनीतिक व्यवस्था की समस्याएं

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात तुरंत संविधान का निर्माण नहीं हो सकता था इसलिए संविधान निर्माण तक भारत में 1935 में बनाए गए संविधान के अनुसार शासन चलता रहा 1950 में नया भारतीय संविधान लागू किया गया परंतु इस नए संविधान में भी अंग्रेजी शासन काल के बहुत से कानूनों को सम्मिलित किया गया जैसे कि भारत को इंडिया घोषित किया गया यहां के प्रांतों को जो अंग्रेजी अंग्रेजों की सुविधा अनुसार बनाए गए थे उन्हें राज्यों का रूप देकर संघ घोषित किया गया अंग्रेजी भाषा को राजभाषा बनाया गया इन सभी बातों ने भारत की अखंडता को भारी नुकसान पहुंचाया ।

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B) सामाजिक समस्याएं

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत स्वतंत्र तो दिखाई देता था । परंतु विदेशी शासक अप्रत्यक्ष रूप से हम पर शासन कर रहे थे । पहले अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया और इसका अपमान किया । परंतु वर्तमान में भी विदेशी वस्तुओं, विचार और संस्कृति हमारे आदर्श बन गए हैं । अंग्रेजी संस्कृति को अपनाना ही आधुनिकीकरण माना जाता है । जिससे भारतीय संस्कृति अपना स्वरूप खोती जा रही है और बहुत सी सामाजिक समस्याओं का जन्म हो गया है । वह समस्याएं निम्नलिखित हैं, जो स्वतंत्रता के बाद भी भारत के लिए चुनौती बने हुए हैं ।

1) हिंदू समाज की असंगठित अवस्था

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह उम्मीद की गई थी कि लोगों में सामाजिक एकता की भावना जन्म लेगी तथा लोग व्यक्तिगत स्वार्थ पर अंकुश लगाकर देश की एकता और अखंडता के लिए प्रयास करेंगे । परंतु जो राष्ट्रीय एकता स्वतंत्रता से पहले थी, वह स्वतंत्रता के बाद समाप्त हो गई । राजनीतिक व्यवस्था स्वार्थी लोगों के हाथ में आ गई और जल्दी ही भारतीय समाज में अनेक वर्ग बन गए ।

जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकतावाद जैसी अनेक समस्याएं और अधिक गंभीर हो गई तथा पिछड़े वर्गों को उच्च हिंदू समाज में निम्न दृष्टि से देखा गया । फलस्वरुप भारतीय समाज भाषा, जाति, धर्म आदि के आधार पर असंगठित हो गई । जो कि आजादी के बाद एक चुनौती बना ।

2) मुस्लिम समाज की निम्न अवस्था

भारत के विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को दुविधा ग्रस्त बना दिया । एक ओर उनका मन पाकिस्तान का समर्थन करता था । क्योंकि उनके अधिकतर संबंधि पाकिस्तान चले गए थे तथा दूसरी ओर उन्हें भारत के प्रति देशभक्त रहना था और उन्हें एक आदर्श नागरिक के रूप में जीवन व्यतीत करना था । इस तरह अधिकतर मुस्लिम लोग भारत के विभाजन के लिए अपने आप को दोषी ठहराते थे और इस तरह भारतीय समाज में मुस्लिम वर्ग अपने आप को पूर्ण रूप से समाहित नहीं कर पा रहा था ।

मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तान चला गया था, इसलिए पाकिस्तान के प्रति मुसलमानों में अब लगाव उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था । परंतु इतना सब होने पर भी वह भारत के नागरिक बने रहना चाहते थे, क्योंकि मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो कि भारत में पला, बड़ा और पैदा हुआ, उनको भारत से बहुत ज्यादा लगाव था । जिन्होंने भारत में रहना ही पसंद किया ।  परंतु फिर भी हिंदू समाज मुसलमानों को शक की दृष्टि से देखता था । ऐसी अवस्था में भारतीय मुस्लिम समाज अत्यंत दुविधा ग्रस्त हो गया ।

3) धार्मिक द्वेष

विभाजन के समय हुई हत्याओं और हिंसा ने दोनों समुदायों का अत्यधिक विनाश किया था तथा स्वतंत्रता के बाद दोनों समुदायों को एक साथ रहना पड़ा । परंतु फिर भी धार्मिक द्वेष समाप्त नहीं हुआ । पाकिस्तान ने इसे और भी बढ़ावा दिया और सदैव यह भी घोषित करने का प्रयास किया कि वह भारतीय मुसलमानों का संरक्षक है । धीरे-धीरे भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग भी इसका समर्थन करने लगा । जिससे धार्मिक द्वेष की भावना और भी भयंकर हो गई ।

4) अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व ऐसे लोगों ने किया था, जिन्हें अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त थी यद्यपि आम जीवन में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता था । परंतु फिर भी अंग्रेजी उच्चता और ज्ञान का प्रतीक बनी रहे, इसलिए भारतीय समाज पर अंग्रेजों का प्रभाव स्वतंत्रता के बाद भी बना रहा ।

संविधान के माध्यम से यद्यपि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया था । परंतु सरकारी कामकाज में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रहा । इस तरह हिंदी भाषा को पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाने लगा । जिससे भारत की राष्ट्रवादी भावनाएं समाप्त होने लगी और अंग्रेजी के प्रति मोह बढ़ता रहा ।

5) गुलाम मानसिकता

भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग मानसिक रूप से अंग्रेजों का गुलाम था, क्योंकि अंग्रेज अंग्रेजी शासनकाल में ऐसे पढ़े-लिखे लोग उच्च पदों पर आसीन थे और इस वर्ग को समाज में विशेष सम्मान दिया जाता था । इस सम्मान को प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक भारतीयों ने अंग्रेजी को अपना आदर्श मान लिया और वह अंग्रेजी सभ्यता, भाषा और रीति-रिवाजों के गुलाम बन गए । विदेशी वस्तुओं को अपनाना, आधुनिकता माना जाने लगा । भारतीय संस्कृति समाज और सभ्यता को पिछड़ा हुआ माना गया । जिससे लोगों में भारतीयता के प्रति स्वाभिमान जागृत नहीं हुआ ।

C) आर्थिक समस्याएं

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के समक्ष अत्यंत गहन आर्थिक समस्याएं थी, क्योंकि लंबे अंग्रेजी शासनकाल में भारत के आर्थिक विकास के लिए कोई भी प्रयास नहीं किए गए, बल्कि अंग्रेज सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाई थी, जिससमें भारतीयों का अहित तथा इंग्लैंड का हित होता था । ऐसी अवस्था में भारत के सामने मुख्य रूप से निम्नलिखित समस्याएं पैदा हुई थी ।

1) बेरोजगारी की समस्याएं

अंग्रेजी शासनकाल में भारत के लघु कुटीर उद्योग नष्ट हो गए । क्योंकि ब्रिटिश वस्तुओं के कारण भारतीय वस्तुओं की मांग समाप्त हो गई । इसके अलावा किसानों की भूमियों को अंग्रेज सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था और लगान की दर भी बहुत अधिक थी । इस तरह से किसानों की दशा भी बहुत खराब हो गई तथा स्वतंत्रता के समय भारतीय जनसंख्या का अधिकतर भाग बेरोजगार हो गया था ।

2) औद्योगिकरण की समस्या

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत के लघु कुटीर उद्योग समाप्त हो गए और भारतीय लोग अपनी आवश्यकताओं के लिए ब्रिटिश उद्योगों पर निर्भर हो गए इस निर्भरता को समाप्त करने के लिए और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिकरण को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी था ।

3) कृषि विकास की समस्याएं

भारत में ब्रिटिश नीतियों के कारण कृषि उत्पादकता बहुत कम हो गई थी । अतः विदेशों से खाद्यान्न आयात करना पड़ता था । जबकि भारत के पास एक बहुत बड़ा कृषि योग्य क्षेत्र था । आधुनिक सुविधाओं की बहुत कमी थी । कृषि को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा था । इसके बावजूद भी उस कृषि भूमि पर उत्पादकता नहीं हो पा रही थी । अतः भारत की आत्मनिर्भरता और आर्थिक विकास के लिए कृषि की उन्नति बहुत जरूरी थी ।

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तो दोस्तों यह थी स्वतंत्रता के बाद की समस्याएं और इनकी चुनौतियां जिनका सामना सरकार को करना था और उसका समाधान भी बहुत जरूरी था । जिससे भारत में एकता अखंडता और जागरूकता पैदा हो वर्तमान समय में भारत में कई सारी चुनौतियां का सामना किया है और समाधान भी किया है । परंतु अभी भी भारत के सामने कई चुनौतियां बनी हुई है । अगर आपको पोस्ट अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ भी जरूर शेयर करें तब तक के लिए धन्यवाद !!

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