भारतीय संविधान का विकास

Hello friends, Gyaan uday में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम बात करते हैं भारतीय संविधान के इतिहास के बारे में । सन 1773 से सन 1947 के बीच अंग्रेज़ों द्वारा कई सारे अधिनियम बनाए गए जिससे भारतीय संविधान के विकास में सहयोग मिला।

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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 1757 में प्लासी और 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल पर कब्ज़ा कर लिया, अंग्रेज़ों ने शासन चलाने के लिए समय समय पर कई Act पारित किए जिनके द्वारा ही भारतीय संविधान के विकास में सहायता मिली ।

तो जानते हैं |

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भारतीय संविधान के विकास के इतिहास के बारे में । सन 1773 से लेकर 1947 तक अंग्रेजों द्वारा कई एक्ट पारित हुए  जो कि निम्नलिखित हैं ।

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1. सन 1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट: इस एक्ट के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार की स्थापना की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे, जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे । इसकी 3 मुख्य विशेषता थीं –

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(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करना ।

(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया ।

(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई ।

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2. सन 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट: इस एक्ट के ज़रिए दोहरे प्रशासन की शुरुआत हुई-

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(i) कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स – व्यापारिक मामलों के लिए ।

(ii) बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए ।

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3. सन 1793 का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम में नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्यवस्था की गई ।

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4. सन 1813 का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के द्वारा निम्नलिखित 3 निर्णय हुए-

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(i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया ।

(ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया गया । लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा ।

(iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया ।

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5. सन 1833 का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम में मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं –

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(i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए ।

(ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की तरफ से सिर्फ भारत का शासन करना रह गया ।

(iii) बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा.

(iv) भारतीय कानूनों को अलग अलग किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई ।

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6. सन 1853 का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के अन्तर्गत सेवाओं में nomination का सिद्धांत समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को भरने के लिए competitive exams की व्यवस्था की गई ।

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7. सन 1858 का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम में ।

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(i) भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के हाथों में सौंपा गया ।

(ii) भारत में मंत्री-पद की व्यवस्था की गई ।

(iii) 15 सदस्यों वाली भारत-परिषद बनाई गई ।

(iv) भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद से सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया ।

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8. सन 1861 का भारत शासन अधिनियम: इस अधिनियम के द्वरा

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(i) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया ।

(ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ ।

(iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई ।

(iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई ।

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9. सन 1892 का भारत शासन अधिनियम: इस अधिनियम के ज़रिए

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(i) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई, और

(ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई ।

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10. सन 1909 का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] –

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(i) पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से प्रतिनिधित्व का प्रबंध किया गया ।

(ii) भारतीयों की सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई ।

(iii) केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला ।

(iv) प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई ।

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11. सन 1919 का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] –

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(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा । राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था । केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे । इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था । दोनों सदनों के अधिकार समान थे । इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था ।

(ii) States में Double शासन प्रणाली का प्रावधान किया गया । इस प्रणाली में प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित ।

(iii) Double शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया ।

(iv) भारतीय सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है ।

(v) इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया ।

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12. सन 1935 का भारत शासन अधिनियम: इस अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्ट थे । इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

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(i) अखिल भारतीय संघ: यह संघ अलग अलग ब्रिटिश प्रान्तों और क्षेत्रों से मिलकर बनना था ।

(ii) प्रांतीय स्वायत्ता: इस अधिनियम में प्रांतो में Double शासन व्यवस्था को समाप्त कर उन्हें एक स्वतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया ।

(iii) केंद्र में Double शासन की स्थापना: कुछ संघीय मामलों जैसे सुरक्षा, विदेशी संबंध, धार्मिक मामलें आदि को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया ।

(iv) संघीय न्ययालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक फैला हुआ था । इस न्यायलय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई । न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल [लंदन] को प्राप्त थी ।

(v) ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के बदलाव का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था । प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका: इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे ।

(vi) भारत परिषद का अंत : इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया ।

(vii) सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: सभी प्रान्तों में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार भी किया गया ।

(viii) इस अधिनियम में प्रस्तावना का कमी था ।

(xi) इस अधिनियम के द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया ।

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13. सन 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम: ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947  को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 को स्वीकार हो गया । इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं । अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं –

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(i) दो अधिराज्यों की स्थापना: 15 अगस्त, 1947 को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी । (अधिराज्य एक राजनीतिक एवं प्रशासनिक संरचना है जिसके तहत अक्सर भाषायी और जातीय विविधता वाले विभिन्न देश अथवा राज्य एक बड़े समूह का निर्माण करते हैं। यह शक्ति के एकीकरण के उद्देश्य से किया जाता है।)

(ii) भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी ।

(iii) संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगीं ।

(iv) भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगें ।

(v) सन 1935 में भारतीय शासन अधिनियम के द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा । (vi) देश की रियासतों पर ब्रिटेन की हुकूमत का अंत कर दिया गया । उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में शामिल होने और अपसी संबंध बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई ।

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