चुनाव और प्रतिनिधित्व

Election and Representative

Hello दोस्तों ज्ञान उदय आपका एक बार फिर स्वागत है, आज हम बात करते हैं चुनाव और प्रतिनिधित्व के बारे में । Election and Representative.

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार

चुनावों का होना बहुत जरूरी है । लोकतंत्र की बुनियाद चुनाव है । चुनाव के जरिए जनता अपनी मनपसंद सरकार को चुनती है और जहां चुनाव होते हैं । वहां पर लोगों को वोट देने का अधिकार दिया जाता है । जिसे कहते हैं, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के जरिए सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से वोट डालने का अधिकार दिया गया है । सार्वभौमिक का मतलब होता है, सभी जगह । वयस्क का मतलब है, जो बड़े हैं यानी किसी निश्चित आयु पूरा होना और मताधिकार का मतलब है, वोट डालने का अधिकार ।

वयस्कों की आयु हर देश में अलग-अलग है । इंग्लैंड, फ्रांस और रूस में यह उम्र 18 वर्ष है । नॉर्वे में 23 वर्ष है । भारत में यह उम्र पहले 21 साल थी, लेकिन 1989 में 61 वे संशोधन के जरिए इसे घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया ।

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भारत का नागरिक हो, मतदाता सूची में उसका नाम हो । किसी भी बड़े अपराध का दोषी ना हो । पागल और दिवालिया ना हो । उसे भारत में वोट डालने और अपनी मनपसंद सरकार चुनने का अधिकार मिल जाता है ।

चुनाव आयोग

भारत में चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग की स्थापना की गई है । अनुच्छेद 324 के जरिए भारत के अंदर एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोग की स्थापना की गई है । चुनाव आयोग हर तरीके के चुनाव करवाता है । चुनाव आयोग के अंदर एक मुख्य चुनाव आयुक्त होता है और दो अन्य आयुक्त होते हैं । मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के अध्यक्ष के रूप में काम करता है ।

चुनाव आयोग के कार्य

चुनाव आयोग के बहुत सारे काम है ।

1 चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन करना ।

जब इलेक्शन होते हैं, तो चुनाव क्षेत्रों को बांटा जाता है । हर इलाके के लोग किसी सरकारी स्थान जैसे कि स्कूल में अपना वोट डालते हैं । तो इसे कहते हैं, चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन चुनाव आयोग ही करता है ।

2 मतदाता सूची का निर्माण करना ।

चुनाव आयोग जब भी इलेक्शन होते हैं, तो उससे पहले मतदाता सूची तैयार करता है और मतदाता सूची के अंदर काट छांट करता है । जैसे कुछ लोग 18 वर्ष के हो गए हैं, तो उनका नाम मतदाता सूची में जोड़ दिया जाता है । कुछ लोग मर चुके हैं या किसी वजह से देश छोड़ चुके हैं, तो उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया जाता है ।

3 चुनाव चिन्ह

चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह प्रदान करता है । किसी को हाथ किसी को कमल किसी को झाड़ू और चुनाव आयोग हर तरीके के चुनाव करवाता है ।

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राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, विधानसभा आदि । हर तरीके के चुनाव चुनाव आयोग ही करवाता है । चुनाव आयोग चुनाव आचार संहिता को लागू करता है ।

4 विशेष नियम लागू करना

जब इलेक्शन होते हैं, तो चुनावों के दौरान कुछ खास नियमों को लागू किया जाता है । उसे कहते हैं, चुनाव आचार संहिता । जैसे 12:00 बजे के बाद लाउडस्पीकर का इस्तेमाल मना है । 2 दिन पहले चुनाव का प्रचार पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है  और चुनाव आयोग मतदान केंद्र का निर्माण करता है ।

5 घोषणा पत्र जारी करवाना

हर पार्टी चुनावों से पहले घोषणा पत्र जारी करती है । जिसे चुनाव घोषणापत्र कहा जाता है । जिसके अंदर पार्टी अपने वादों को जनता के सामने रखती है और जनता के मत हासिल करने की पूरी कोशिश करती है ।

6 अन्य कार्य

चुनाव आयोग बूथ का निर्माण करता है । मतगणना करके परिणाम घोषित करता है । जब इलेक्शन होते हैं, तो सरकारी कर्मचारी ड्यूटी के दौरान चुनाव आयोग के अधीन काम करते हैं, ना कि सरकार के अधीन ।

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सर्वाधिक वोट जीत प्रणाली

दोस्तों चुनाव करवाने के बहुत सारे तरीके हैं, लेकिन हम अपनी चुनाव प्रणाली में इतने ज्यादा व्यस्त हैं कि किसी दूसरे तरीके के बारे में हमें सोचने का मौका नहीं मिल पाता । जिस प्रणाली को हमारे देश में अपनाया जाता है, वह है “सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली” यानी जो सबसे ज्यादा वोट लेगा उसको जीत हासिल होगी । इस प्रणाली के अंदर एक देश को उतने निर्वाचन क्षेत्रों में बांट दिया जाता है, जितने प्रतिनिधि चुने जाने हैं और हर निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधित्व चुना जाता है । इसे ही सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली कहा जाता है । विजयी प्रत्याशी के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसे वोटों का बहुमत मिले । इसे बहूवादी व्यवस्था भी कहते हैं । मिसाल के लिए भारत के अंदर लोकसभा की 545 सीटें हैं और 543 सदस्य जनता के द्वारा चुने जाते हैं । तो पूरे भारत को 545 हिस्सों में बांट दिया जाता है और हर हिस्से से एक प्रतिनिधि चुना जाता है । इसी तरीके से दिल्ली के अंदर विधानसभा की 70 सीट है । तो दिल्ली को 70 हिस्सों में बांट दिया जाता है । हर एक हिस्से से कई प्रतिनिधि चुनाव लड़ने के लिए खड़े होते हैं । लेकिन उनमें से कोई एक ही जीतेगा जिसे विधानसभा का सदस्य बनाया जाएगा ।

सर्वाधिक वोट जीत प्रणाली के लाभ हानि

सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली के कई सारे फायदे हैं । यह प्रणाली बहुत आसान है । एक आम मतदाता इसको आसानी से समझ सकता है । इसमें खर्चा भी कम होता है और चुनाव का कार्य भी बहुत जल्दी से पूरा हो जाता है ।

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लेकिन इसके नुकसान भी हैं । अगर मैदान में उम्मीदवार ज्यादा होते हैं । तो कभी-कभी ऐसा उम्मीदवार भी जीत जाता है । जिसे ज्यादातर लोग पसंद नहीं करते ।

उदाहरण के लिए एक सीट पर 3 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं । A, B, और C और कुल वोटों की संख्या 100 है । A को मिलते हैं, 40 वोट । B को मिलते हैं 30 वोट और C को मिलते हैं, 30 वोट । इस तरीके से कुल वोटों की संख्या 100 हो गई । यहां पर A को जीता हुआ मान लिया गया क्योंकि उसे सबसे ज्यादा वोट मिले हैं । लेकिन अगर दूसरे नजरिए से देखा जाए तो एक को पसंद ना करने वाले लोगों की तादाद 60 है । अगर B और C के वोटों को जोड़ा जाए तो, कुल वोट जोड़ने पर 60 बनते हैं । यानी 60 लोग ऐसे हैं, जो A को पसंद नहीं करते । फिर भी A जीत गया ।

तो इसमें क्या होता है, वोट बट जाते हैं और कभी-कभी ऐसा व्यक्ति भी जीत जाता है । जिसे जनता पसंद नहीं करती । सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली के अंदर राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा क्षेत्रीय हितों को ज्यादा महत्व दिया जाता है । यानी कोई भी उस दल को या उस पार्टी को वोट देना पसंद नहीं करता जो राष्ट्रहित उठाता है, बल्कि जो नेता आपसे कहेगा कि मैं आपकी गली बनवा दूंगा ! मैं सड़क बनवा दूंगा ! मैं आपकी जरूरतों को पूरा कर दूंगा ! आप उसे वोट दोगे । उसी तरीके से अगर कोई राष्ट्रीय मुद्दा उठाता है कि मैं देश का विकास कर दूंगा तो उस पार्टी की तरफ लोग कम ध्यान देते हैं और इसमें उम्मीदवार उन लोगों के वोट हासिल करने के लिए झूठे झूठे वादे भी करता है । इसे कहते हैं सर्वाधिक वोट जीत प्रणाली ।

चुनाव के अन्य तरीके

आइए अब चुनाव के दूसरे तरीको के बारे में जानते हैं, जिसमें मतदाता का एक वोट भी बेकार नहीं जाता । सर्वाधिक वोट जीत प्रणाली में क्या होता है । अगर आपने किसी उम्मीदवार को वोट दे दिया और वह उम्मीदवार हार गया तो आपका वोट बेकार चला गया । लेकिन दूसरा तरीका ऐसा है, जिसमें एक वोट भी बेकार नहीं जाता । उसे कहते हैं, समान अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली । समान समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अंदर एक निर्वाचन क्षेत्र लिया जाता है और उस निर्वाचन क्षेत्र से कई प्रतिनिधित्व को चुना जाता है । इसे ही कहते हैं, समान समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली । इस प्रणाली में हर उम्मीदवार को या हर पार्टी को वोटों के अनुपात में सीट मिलती हैं ।

समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के लाभ हानि

सबसे पहला फायदा तो इसका यही है कि हर पार्टी को वोटों के अनुपात में सीट मिलती हैं । दूसरा फायदा इसका यह है कि मतदाता का एक भी वोट बेकार नहीं जाता । मिसाल के लिए यहां पर तीन पार्टियां खड़ी हुई हैं या तीन उम्मीदवार खड़े हुए हैं । एक को 40 वोट मिले । दूसरे को 30 वोट मिले और तीसरे को भी 30 वोट मिले । तो यहां पर सीटें भी उनको वोटों के प्रतिशत में मिलेंगी । यानी यह नहीं देखा जाएगा कि इनमें से जिसको ज्यादा वोट मिले । उसको जिता दिया जाएगा । बल्कि नहीं यहां पर वोटों के अनुपात के हिसाब से उम्मीदवार को सीटें मिलेंगी और मतदाता को एक बोर्ड भी बेकार नहीं जाएगा तो इस प्रणाली के काफी सारे फायदे हैं ।

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लेकिन इसके नुकसान भी हैं । इसमें गठबंधन सरकार बनती है । इसलिए सरकार कमजोर होती है । मतगणना करने में बहुत समय लग जाता है और यह प्रणाली बहुत खर्चीली भी है ।

भारत के अंदर सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली को अपनाया जाता है । लेकिन कभी-कभी यह चीज हमारे लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक भी साबित हो जाती है ।

1984 की लोकसभा चुनावों पर जरा एक बार नजर डालते हैं । 1984 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 48 प्रतिशत वोट मिले । जबकि सीटें मिली 543 में से 415 । दूसरी तरफ बीजेपी को देखते हैं, जिसे 7.4 प्रतिशत वोट मिले और सीटें मिली सिर्फ 21 और तेलुगु देशम पार्टी को देखते हैं तेलुगु देशम को 4.1 प्रतिशत वोट मिले और सीटें मिली 30 ।

तो सर्वाधिक वोट से जीत प्रणाली में क्या होता है । पार्टी को वोटों के अनुपात में कम या ज्यादा सीट मिल जाती हैं । लेकिन समान अनुपातिक प्रतिशत प्रणाली के अंदर हर पार्टी को वोटों के अनुपात के अनुसार ही सीटें मिलती हैं ।

चुनाव करवाने के हालाकि कि कई तरीके हैं । अगर आजादी से पहले के चुनाव पर नजर डालें तो अंग्रेजों ने पृथक निर्वाचन क्षेत्र को अपनाया था । इस निर्वाचन क्षेत्र के अंदर किसी एक निर्वाचन क्षेत्र को किसी खास जाति या धर्म के लिए आरक्षित कर दिया जाता है । उस इलाके से या उस क्षेत्र से उसी जाति या धर्म को उम्मीदवार इलेक्शन लड़ सकते हैं और उसी जाति या धर्म के लोग वोट डाल सकते हैं । इस तरीके को अंग्रेजों ने अपनाया था । भारत की एकता को खत्म करने के लिए ।

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दूसरा है, आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र । इसके अंदर सभी लोग वोट डालते हैं, सभी उम्मीदवारों को । लेकिन उम्मीदवार उसी जाति या वर्ग का होता है । जिसके लिए वह सीट आरक्षित की गई है । भारत की 543 सीटों में से 79 सीटें एससी के लिए और 41 सीटें एसटी के लिए आरक्षित की गई हैं । भारत के लोकतंत्र के सामने काफी सारी समस्याएं हैं, परेशानियां हैं । इसलिए चुनावों के अंदर सुधार करने के लिए भी सुझाव दिए जाते हैं । जैसे कि कुछ लोगों का मानना है कि भारत को सर्वाधिक वोट जीत प्रणाली की जगह समान अनुपातिक प्रणाली को अपना लेना चाहिए और चुनाव को के अंदर अपराधी प्रवृत्ति के उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए । धन और बल का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं होना चाहिए और एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए भी आरक्षित कर देनी चाहिए ।

इस तरीके से भारत के चुनाव के अंदर कुछ हद तक सुधार किया जा सकता है ।

तो दोस्तों आज के लिए इतना ही । अगर आपको यह Post अच्छी लगे तो अपने दोस्तों के साथ Share करें । Latest Post के लिए Subscribe करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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