गांधीवाद क्या है ?

गाँधीदर्शन और गाँधीवाद में क्या अंतर है ?

Hello दोस्तों ज्ञानउदय में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम बात करते हैं, राजनीति विज्ञान में एक महत्वपूर्ण Topic ‘गांधीवाद’ (Ghandhism) के बारे में और साथ ही साथ हम यह भी जानेंगे गांधी दर्शन क्या है और इस और यह गांधीवाद से किस तरह से अलग माना जाता है । तो चलिए जानते हैं, आसान भाषा में ।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आजकल गांधी जी के विचारों को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है और आज के समय में भी गांधी जी के विचारों को उतना ही प्रासंगिक माना जाता है, जितना कि ये गांधीजी के समय में थे । गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों को लेकर एक नया शब्द भी प्रचलित हुआ है, जिसे गांधीगिरी कहते हैं ।

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गाँधीवाद क्या है ?

आइए सबसे पहले हमें जानते हैं कि गांधीवाद किसे कहते हैं ? महात्मा गांधी आधुनिक भारत के महान व्यक्ति रह चुके हैं । जिन्हें राष्ट्रपिता और महात्मा की उपाधि दी गई है । गांधीजी अपने जीवन में एक महान राजनेता, व्यवहारिक राजनीतिज्ञ व सच्चे कर्मयोगी थे । गांधी जी ने विश्व के लिए सत्य, अहिंसा से युक्त नैतिकता पर आधारित राजनीति का मार्ग चुना । देश को यह गांधीजी की क्रांतिकारी व मौलिक देन है । अगर कहा जाए तो गांधीजी के विचार और सिद्धांत ही गांधी जी के संपूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति है । गांधी जी को अपने युग का एक महान नेता माना जाता है । गांधी जी ने ही सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का व्यवहारिक जीवन में प्रयोग भी किया है और व्यक्तियों का मार्गदर्शन किया ।

“गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को गांधीवाद के नाम से जाना जाता है ।”

अन्य विचारकों हॉब्स, जॉन लॉक, रूसो और कार्ल मार्क्स की तरह गांधीजी ऐसे विचारक नहीं थे, जिन्होंने अपना जीवन किसी व्यवस्थित दर्शन के निर्माण में लगाया हो ।

“गांधी जी के विचारों सिद्धांतों और मान्यताओं का सामूहिक करण ही गांधीवाद कहलाता है ।”

गांधीजी के विचार वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने में आज भी उपयोगी है ।

गांधी जी ने अन्याय और शोषण को समाप्त करने के लिए शांति और अहिँसा का रास्ता चुना । गांधी जी ने समय-समय पर अपने लेखों भाषणों और पत्रों में बाहरी समाज व्यवस्था के बारे में अपने विचार दिए हैं ।

इन सभी विचारों और शिक्षाओं के कारण ही गांधी जी को अक्सर गांधीवाद कह दिया जाता है, लेकिन इस शब्द के इस्तेमाल पर गांधी जी को स्वयं आपत्ति थी । गांधी जी का यह कहना था कि

“गांधीवाद नाम की कोई वस्तु नहीं हो और मैं अपने बाद कोई ‘वाद’ या ‘संप्रदाय’ नहीं छोड़ना चाहता । मैं कभी इस बात का दावा नहीं करता कि मैंने कोई नया सिद्धांत चलाया है । आप लोग इसे गांधीवाद ना कहें इसमें ‘वाद’ जैसा कुछ नहीं ।”

यद्यपि गांधीजी को गांधीवाद शब्द पर आपत्ति थी, तो इस तरह सबसे पहले कराची में गांधी इरविन समझौता के बाद एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने ही कहा था कि

“गांधी मर सकता है, पर गांधीवाद सदा जीवित रहेगा ।”

गाँधीदर्शन और गाँधीवाद

अपने जीवन मे गांधी जी ने बहुत सारे आंदोलन चलाये और अनेकों विचार दिए । उनके विचारों को गांधी मार्ग या गांधी दर्शन कहा जा सकता है । गांधीजी ने इतिहास में पहली बार सत्य अहिंसा प्रेम और आत्मा की शक्ति जैसे आध्यात्मिक सिद्धांतों का राजनीति के क्षेत्र में प्रयोग किया और इस में सफलता हासिल की । गांधी जी का कहना था कि स्वराज का दूसरा नाम प्रशासन है ।

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गांधीजी के विचार जो दार्शनिक है, जिनके द्वारा व्यक्तियों को ज्ञान मिलता है, गाँधीदर्शन कहलाता है । गांधी जी का जीवन ही गाँधीदर्शन है ।

दो कारणों से गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को गांधीवाद का नाम दिया जाता है ।

1) गांधीजी ने प्राचीन सिद्धांतों का प्रयोग वर्तमान युग की आवश्यकता ओं के अनुरूप नए ढंग से किया था ।

2) गांधी जी ने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के प्रयोग से व्यक्तिगत स्तर से सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आये ।

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गांधीजी ने सत्याग्रह के मार्ग को अपनाया । सत्याग्रह सत्य, अहिंसा और प्रेम का मिश्रण है । गांधीजी का मत है कि सत्याग्रह एक ऐसा विश्वास है, जिसके द्वारा बिना किसी हिंसा के व्यक्ति अपने हक़ के लिये लड़ सकता है ।

हालांकि गांधी जी द्वारा लिखी हुई सामग्री, रचनाएं एक जगह संकलित ना होकर जगह-जगह फैली हुई है । मार्क्सवाद और लेनिनवाद की तरह एक जगह एकत्रित नहीं है, फिर भी यह जीवन मार्ग के रूप में गांधीवाद में वह समस्त विशेषताएं हैं, जो एक वाद के लिए बेहद जरूरी हैं । जो कि व्यक्तियों के लिये आवश्यक है ।

तो दोस्तों ये था गाँधीवाद और उनके दर्शन के बारे में । अगर Post अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ ज़रूर Share करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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