गठबंधन की राजनीति

Politics of Alliance

गठबंधन की राजनीति

Hello दोस्तों ज्ञानोदय में आपका स्वागत है । आज हम बात करते हैं, गठबंधन की राजनीति के बारे में । भारत में गठबंधन प्रणाली की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद हो चुकी थी हालांकि आजादी से पहले बहुत सारे दल थे । आजादी के बाद भी दलों के निर्माण की स्वतंत्रता दी गई थी । (अनुच्छेद 19 के जरिए) इसलिए आजादी के बाद बहुत सारे दलों का निर्माण हुआ ।

गठबंधन का उदय

भारतीय राजनीति के शुरुआती दौर को कांग्रेस प्रणाली का दौर भी कहा जाता है । धीरे-धीरे कांग्रेस की लोकप्रियता में कमी की वजह से बाकी दूसरे दलों को उभरने का मौका मिला । भारत में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत होने लगी । आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार को पहली गठबंधन सरकार माना जाता है । उसके बाद 1977 से लेकर और 1989 में और 1989 से लेकर आज तक गठबंधन का दौर चल रहा है ।

गठबंधन के उदय के कारण

गठबंधन सरकारों के उदय के पीछे कई कारण हैं ।

पहला कारण है, कांग्रेस की लोकप्रियता में कमी । आजादी के बाद कांग्रेस बहुत बड़ी लोकप्रिय पार्टी थी । इसलिए सभी लोग कांग्रेस को वोट देते थे और हर बार कांग्रेस को सरकार बनाने का ही मौका मिलता था । पहले 3 आम चुनावों में कांग्रेस को बहुत जबरदस्त सफलता मिली । इसलिए कांग्रेस की सरकार बनी । पहले 3 आम चुनावों में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ दूसरा 1957 में और तीसरा 1962 में हुआ । इन तीनों आम चुनावों में कांग्रेस को बहुत बड़ी सफलता मिली । लेकिन धीरे-धीरे करके कांग्रेस की लोकप्रियता में कमी आने लगी । जैसे 1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार गरीबी खत्म करने में नाकामयाब रही । 1975 में कांग्रेस ने आपातकाल लगा दिया जिसके कारण सभी लोग कांग्रेस के खिलाफ हो गए और बाकी दलों को आगे बढ़ने का मौका मिल गया जिसके कारण गठबंधन को बढ़ावा मिला ।

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दूसरा कारण है, दलित जागरूकता । आजादी के तुरंत बाद दलित कांग्रेस के साथ जुड़े रहे लेकिन कांग्रेस ने दलितों की तरफ ध्यान नहीं दिया । इसलिए 1960 के दशक में बहुत सारे दलित आंदोलन हुए और दलितों का समर्थन करने वाली पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP) का उदय हुआ । इससे भी गठबंधन सरकारों को बढ़ावा मिला ।

तीसरा क्षेत्रीय दलों का महत्व तेजी से बढ़ने लगा । भारत में आजादी के बाद विकास करने के लिए नियोजित को अपनाया गया । लेकिन सभी क्षेत्रों का समान रूप से विकास नहीं हो पाया । अब पिछड़े क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्र के दल को वोट देने लगे । इससे केंद्र में किसी भी एक दल को बहुमत मिलना मुश्किल हो गया, जिससे गठबंधन को बढ़ावा मिला और राष्ट्रीय स्तर के दलों में फूट पैदा होने लगी ।

कांग्रेस का विघटन

आजादी के बाद कई बार कांग्रेस का बंटवारा हुआ । 1948 में कांग्रेस से टूटकर सोशलिस्ट पार्टी (Socialist Party) बनी । 1959 में कांग्रेस से टूटकर स्वतंत्र पार्टी बनी । 1969 में कांग्रेस से टूटकर कांग्रेस का बंटवारा हो गया था । कांग्रेस आर (Congress R)और कॉन्ग्रेस ओ (Congress O) दो पार्टियां बनी । इस तरीके से कांग्रेस का कई बार बंटवारा हुआ । 1962 के बाद भारत और चीन युद्ध के बाद सीपीआई (CPI) का बंटवारा हो गया था । सीपीआई में से टूटकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया में से सीपीआईएम ( CPIM) बनी यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्क्सवादी और 1977 के चुनावों के बाद जनता पार्टी की टूट के साथ ही बहुत सारे दल बनने लगे जिससे दलों की तादाद बढ़ने लगी और केंद्र में किसी भी एक दल को बहुमत मिलना मुश्किल हो गया ।

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नए राज्यों के निर्माण की मांग से भी गठबंधन सरकारों को बढ़ावा मिला । भारत में आजादी के बाद भाषा के नाम पर राज्यों का निर्माण किया गया और सबसे पहले 1967 में तमिलनाडु ने डीएमके (DMK) को भाषा के नाम पर सफलता मिली । इसके बाद इसी तरीके की प्रवृत्ति को लेकर और भी राज्यों में विवाद पैदा होने लगा जैसे पंजाब में अकाली दल को सफलता मिली । काफी सारे राजनीतिक दलों ने नए राज्यों के निर्माण के लिए आंदोलन चलाए । जैसे बिहार में एक दल था जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा जिसने जब झारखंड नाम का राज्य बन गया तो झारखंड मुक्ति मोर्चा को सफलता मिल गई ।

गठबंधन सरकार की विशेषता

अब हम जानते हैं गठबंधन सरकार की विशेषताएं क्या होती हैं ? मिली जुली सरकार में कम से कम 2 दल भागीदार होते हैं । भागीदार दल कुछ प्राप्त करने के लिए गठबंधन की राजनीति को अपनाते हैं । गठबंधन अस्थाई होते हैं । कभी भी टूट सकते हैं । गठबंधन के अंदर यह देखा जाता है कि जो प्रमुख दल होते हैं । वह सारी सत्ता अपने पास रखने की कोशिश करता है । आजादी के बाद कई गठबंधन सरकारे बनी । सबसे पहली गठबंधन सरकार 1977 की जनता पार्टी थी । इस सरकार ने 1977 में जब चुनाव हुए तो कई दलों ने मिलकर जनता पार्टी का निर्माण किया था । जनता पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला था हालांकि यह सरकार ज्यादा नहीं चल पाई । लेकिन देश के अंदर पहली बार कांग्रेस विरोधी और गठबंधन सरकार बनी । इस सरकार में सबसे पहले मोरारजी देसाई और बाद में चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने । दूसरी गठबंधन सरकार 1989 में बनी राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार जिसमें वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया । राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बीजेपी और वाम मोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया । लेकिन 11 महीने बाद बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया । इसलिए यह सरकार गिर गई । इसके बाद नवंबर 1990 में चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल सेकुलर की सरकार बनी । जिसको कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया लेकिन यह सरकार भी ज्यादा नहीं चल पाई और कुछ समय बाद यह सरकार भी गिर गई । एक बात ध्यान देने वाली यह है कि जिस सरकार को कांग्रेस समर्थन देती है, उसे बीजेपी कभी समर्थन नहीं देती और जिसे बीजेपी समर्थन देती है, उसे कांग्रेस कभी समर्थन नहीं देती ।

1996 और 1998 में भी बहुत सारी सरकार बनी । 1996 में जो चुनाव हुए तो बीजेपी सबसे बड़ा दल बना लेकिन किसी दूसरे दल का समर्थन ना मिलने की वजह से सिर्फ 13 दिन सरकार चल सकी । दोबारा चुनाव हुए तो आई के गुजराल की सरकार बनी । उसके बाद फिर दोबारा चुनाव हुए एच. डी. देवेगौड़ा की सरकार बनी । अब 1998 तक आते-आते ज्यादातर दलों को यह एहसास हो चुका था कि अकेले सरकार बनाना नामुमकिन है । इसलिए कुछ दलों ने चुनावों से पहले ही गठबंधन बना लिए । बीजेपी ने एनडीए(NDA) नाम का एक गठबंधन बनाया (National Democratic Alliance) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन । इस गठबंधन के अंदर 19 दलों को शामिल किया गया तो 1998 के चुनावों में एनडीए को यानी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को बहुमत मिला 545 में से 305 सीटें एनडीए को मिली । इस तरीके से एनडीए की सरकार बनी । लेकिन गठबंधन के आपसी विवादों की वजह से यह सरकार लंबे वक्त तक नहीं चल पाई और 13 महीने बाद ही यह सरकार गिर गई । तेहरा का आंकड़ा अटल बिहारी जी के लिए थोड़ा सा ठीक नहीं रहा क्योंकि जब 1996 में बीजेपी को सरकार बनाने का मौका मिला तो सिर्फ 13 दिन ही सरकार चल पाई । 1998 में सरकार बनाने का मौका मिला तो सरकार सिर्फ 13 महीने ही सरकार चल सकी । अब 13 महीने के बाद दोबारा चुनाव हुए 1999 में जिस में एनडीए को एक बार फिर बहुमत मिला । अबकी बार इस सरकार ने 5 साल पूरे किए । यह पहली गठबंधन सरकार थी जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया था । 1999 के 5 साल बाद फिर 2004 में चुनाव हुए तो बीजेपी की तरह कांग्रेस ने भी अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अपना गठबंधन तैयार किया जिसे यूपीए (UPA) के नाम से जाना जाता है (United Progressive Alliance) यानी संयुक प्रगतिशील गठबंधन तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को यूपीए को बहुमत मिला । इसलिए डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया गया । 2004 के बाद 5 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद 2009 में चुनाव हुए । अब इन चुनावों में भी यूपीए को एक बार फिर बहुमत मिला । इसलिए एक बार फिर डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया ।

2014 में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुए इन चुनावों को ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि 2014 के चुनावों में पहली बार आजादी के बाद पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को पूरा का पूरा बहुमत मिला । इन चुनावों में 545 में से बीजेपी को 282 सीटें मिली यानी पूरा पूरा बहुमत मिला और एनडीए को बीजेपी के गठबंधन को 336 सीटें मिली । इसलिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया गया ।

लेकिन हम अब यह न समझे कि आगे चलकर गठबंधन की राजनीति खत्म हो चुकी है । आगे के चुनाव यह तय करेंगे कि भारत के अंदर गठबंधन की राजनीति लगातार रहती है या नहीं रहती है । तो दोस्तों आज के लिए इतना ही अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें । धन्यवाद !!

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