अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विकास के चरण

Development steps of International Politics

Hello दोस्तों ज्ञानउदय में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम बात करते हैं, अंतरराष्ट्रीय राजनीति विज्ञान के अंतर्गत  इसके विकास के चरण (Development steps of International Politics in Hindi) के बारे में । हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विकास का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है, बल्कि यह विषय बीसवीं शताब्दी की उपज है । आइए जानते हैं इसके विकास के चरण के बारे में, आसान भाषा में

पिछली एक शताब्दी से इस विषय के इतिहास पर नज़र डालें तो इस विषय में आए उतार-चढ़ाव के साथ-साथ किसके एक स्वायत्त विषय में स्थापित होने के बारे में जानकारी मिलती है । इस विषय में आए बहु आयामी परिवर्तनों ने जहां एक और विषय वस्तु का संवर्धन, समन्वय तथा विकास किया है । वहीं दूसरी तरफ विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन करके बहुत सी जटिल समस्याओं के पहलुओं को समझने में भी सहायता प्रदान की है |

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स्पष्ट रूप से देखा जाए तो वेल्स विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय वुडरो विल्सन पीठ की 1919 में स्थापना के बाद से ही इसका इतिहास शुरू हुआ माना जाता है । इस पीठ का प्रथम आसीन होने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर एल्फर्ड जिमरन थे तथा बाद में अन्य प्रमुख विद्यमान हुए, जिन्होंने इस पीठ को सुशोभित किया और उसमें सबसे प्रमुख थे सी के वेबस्टर, ई एच कार, पी ए रेनाल्ड, लारेंस डब्ल्यू, मार्टिन, टी ई एवांज आदि । इसी समय अन्य विश्व विद्यालय संस्थानों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था देखने को मिली ।

कैनेथ थॉमसन ने सन 1962 के रिव्यु ऑफ पॉलिटिक्स में प्रकाशित अपने लेख में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के इतिहास को चार भागों में बाटा है । जिसके आधार पर इस विषय का सुस्पष्ट व  सुनिश्चित अध्यन संभव हो सकता है । विकास के इन चार चरणों में शीतयुद्ध के दौरान पांचवें चरण को भी सम्मिलित किया जा सकता है । इसका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार से हैं ।

1) कूटनीतिक इतिहास का प्रभुत्व प्रारंभ से 1919 तक

 2) सामयिक घटनाओं एव समस्याओं का अध्ययन 1919 से 1939 तक

3) राजनीतिक सुधारवाद का युग 1939 से 1945 तक

4) सैद्धांतिकरण के प्रति आग्रह 1945 से 1991तक और

5) वैश्वीकरण ब गैर सिद्धांत ई करण का योग 1991 से 2003

आइए अब इन विकास के चरणों को विस्तार से जान लेते हैं । तो सबसे पहला है

1) कूटनीति इतिहास का प्रभुत्व प्रारंभ से 1919 तक

प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व इतिहास, कानून, राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि के विद्यमान ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अलग-अलग पहलुओं पर विचार करते थे । मुख्य रूप से इतिहासकार ही इसका अध्ययन राजनयिक इतिहास तथा अन्य देशों के साथ संबंधों को इतिहास के रूप में करते थे । इसके अंतर्गत कूटनीतिज्ञ व विदेश मंत्रियों द्वारा किए गए कार्यों का लेखा-जोखा भी होता था । अतः इसे कूटनीतिक इतिहास की संज्ञा भी दी जाती है । प्रोफेसर ई एच कार के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व, युद्ध का संबंध केवल सैनिकों तक समझा जाता था तथा इसके समकक्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संबंध राजनयिकों तक था । इसके अलावा प्रजातांत्रिक देशों में भी परंपरागत रूप से विदेश नीति को दलगत राजनीति से अलग रखा जाता था तथा चुने हुए अंग भी अपने आप को विदेशी मंत्रालय पर अंकुश रखने में असमर्थ महसूस करते थे ।

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सन 1919 से पहले इस विषय के प्रति उदासीनता के कई प्रमुख कारण थे, जिसमें प्रमुख इस समय तक यही समझा जाता था कि युद्ध व राज्यों में गठबंधन उसी तरह स्वाभाविक है । जैसे गरीबी व बेरोजगारी । तथा युद्ध विदेश नीति एवं राज्यों के मध्य परस्पर संबंधों को रोक पाना मानवीय सामर्थ्य के बस से बाहर माना जाता था ।

दूसरा कारण प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व युद्ध इतने भयंकर नहीं होते थे तथा तीसरा कारण

संचार साधनों के अभाव में अंतरराष्ट्रीय राजनीति कुछ गिने-चुने राज्यों तक ही सीमित थी ।

इस तरह से इस युग में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन की सबसे बड़ी कमी सामान्य हितों का विकास रहा है । इस काल में केवल राजनीतिक इतिहास का वर्णन अध्ययन मात्र ही हुआ । जिसके परिणाम स्वरूप इससे ना तो वर्तमान नहीं भावी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने में कोई मदद मिली । इस युग की मात्र उपलब्धि 1919 में वेल्स विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के पीठ की स्थापना रही है ।

2) सामयिक घटनाओं व समस्याओं का अध्ययन 1919 से 1939 तक

दो विश्व युद्धों के बीच के काल में दो समांतर धाराओं का विकास हुआ । जिनमें से प्रथम के अंतर्गत पूर्व ऐतिहासिकता के प्रति प्रभु को छोड़कर सामयिक घटनाओं व समस्याओं के अध्ययन पर अधिक बल दिया जाने लगा । इसके साथ-साथ अब ऐतिहासिक राजनीतिक अध्ययन को वर्तमान राजनैतिक संदर्भों के साथ जोड़कर देखने का प्रयास भी किया गया ऐतिहासिक प्रभाव के कम होने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु एक समग्र दृष्टिकोण का अभाव अभी भी बन रहा है ।

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इस काल में वर्तमान के अध्ययन पर तो बहुत बल दिया गया, लेकिन वर्तमान अतीत के पारस्परिक संबंध के महत्व को अभी भी पहचान पहचाना नहीं गया । इसके अलावा न ही युद्ध के बाद राजनीतिक समस्याओं को अतीत की तुलना समस्याओं के साथ रखकर देखने का प्रयास भी किया गया । शायद इसलिए इस युग में भी दो मूलभूत कमियां स्पष्ट रूप से उजागर रहीं । पहली इसके पहले चरण की भांति ही इस काल में भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सार्वभौमिक सिद्धांत का विकास नहीं हो पाया तथा दूसरी आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन अधिक स्पष्ट एव तर्कसंगत नहीं बन पाया ।

इस तरह इस चरण में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में बल देने की स्थिति में बदलाव के अलावा बहुत ज्यादा परिवर्तन देखने को नहीं मिला तथा ना ही इस विषय के स्पष्ट रूप से स्वतंत्र अनुशासन बनने की पुष्टि हुई ।

3)राजनैतिक सुधारवाद का युग 1939 से 1945 तक

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विकास का तृतीय चरण भी द्वितीय चरण के समानांतर दो विश्व युद्धों के बीच का काल रहा है । इसे सुधारवादी युग इसलिए कहा जाता है कि इसमें राज्यों द्वारा राष्ट्र संघ की स्थापना के माध्यम में से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सुधार की कल्पना की गई । इस युग में मुख्य रूप से संस्थागत विकास किया गया । इस काल के विद्वानों, राजनयिकों, राजनेताओं व चिंतकों का मानना था कि यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का विकास हो जाता है, तो विश्व समुदाय के सम्मुख उपस्थित युवा शांति की समस्याओं का समाधान संभव हो सकेगा । इस उद्देश्य हेतु कुछ कानूनी या नैतिक उपागम की संरचनाएं की गई जिसमें निम्न मुख्य आधार थे ।

1 शांति स्थापित करना, सभी राष्ट्रों का साझा हित है । अतः राज्यों को हथियारों का प्रयोग त्याग देना चाहिए ।

2 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कानून व व्यवस्था के माध्यम से झगड़ों का निपटारा किया जा सकता है ।

3 राष्ट्र की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कानून के माध्यम से अनुचित शक्ति प्रयोग को प्रतिबंधित किया जा सकता है ।

4 राज्यों की सीमा परिवर्तन का कार्य भी कानून या बातचीत द्वारा हल किया जा सकता है ।

इन्हीं आदर्शवादी एव नैतिक मूल्यों पर बल देते हुए अंतरराष्ट्रीय संगठन, राष्ट्र संघ की परिकल्पना की गई है । इसकी स्थापना के उपरांत यह माना गया है कि अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राज्य के मध्य शांति बनाने का संघर्ष समाप्त हो गया । नई व्यवस्था के अंतर्गत शक्ति संतुलन का कोई स्थान नहीं होगा । अब राज्य अपने विवादों का निपटारा संघ के माध्यम से करेंगे । अतः इस युग में न केवल युद्ध व शांति की समस्याओं का विवेचन किया गया है । अपितु इसके दूरगामी प्रभावों के बारे में भी सोचा गया है ।

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अतः अध्ययन कर्ताओं के मुख्य बिंदु भी कानूनी समस्याओं व संगठनों के विकास के साथ साथ इनके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप को बदलने वाला रहा है । अंततः इस काल में भावात्मक, कल्पनाशील व नैतिक सुधारवाद पर अधिक बल दिया गया है । परंतु विश्व युद्धों के बीच इन उपागमों की सार्थकता पर हमेशा प्रश्नचिन्ह लग रहा है । राष्ट्र संघ की प्रथम दशक की (1919 से 1929) की गतिविधियों से जहां आशा की किरण दिखाई दी, वही दूसरे की यथार्थवादी स्थिति में इस धारणा को बिल्कुल समाप्त कर दिया गया । बड़ी शक्तियों के मध्य सहयोग व गुटबन्दियों ने शांति की स्थापना की बजाय, शक्ति संघर्ष को जन्म दिया । जापान ने मंचूरिया पर हमला करके जहां शांति को भंग कर दिया । वहीं इटली, जर्मनी और रूस ने भी विवादास्पद स्थितियों में न केवल राष्ट्र संघ की सदस्यता ही छोड़ी बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ होने की प्रक्रिया को और तीव्र बना दिया । इस प्रकार शांति, नैतिकता व कानून से विश्व व्यवस्था नहीं चल सकी तो, ई एक कार, शुमा, क्विंसी राइट आदि लेखकों के कारण यथार्थवादी दृष्टिकोण को वैकल्पिक उपागम के रूप में बल मिला ।

4) सैद्धांतिकरण के प्रति आग्रह 1945 से 1991 तक

इस चरण में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मूलभूत परिवर्तनों से न केवल इसकी विषय वस्तु व्यापक हुई है, बल्कि इसमें बहुत सारी जटिलताएं भी पैदा हो गई हैं । शीत युगीन काल में राजनीति के स्वरूप में परिवर्तन तथा नए राज्यों के उदय ने संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिवेश को ही बदल दिया । परिणाम स्वरूप नए उपागम, आयामों, संस्थाओं व प्रविष्टियों का सृजन हुआ । जिनके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन सुनिश्चित हो गया । पूर्व चरणों का आदर्श संस्थागत नैतिक कानूनी और सुधारवादी धाराओं की असफलताओं ने नए उपागम के विकास की ओर अग्रसर किया । यह नया उपगम था – यथार्थवाद । वैसे तो अनेक विचारकों ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया । परंतु मरगेन्थयू ने इसे एक सामान्य सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया । इस सिद्धांत के अनुसार राज्य हमेशा अपने हितों की पूर्ति हेतु संघर्षरत रहते हैं । अतः अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने हेतु इस शक्ति संघर्ष के विभिन्न आयामों को समझना बहुत जरूरी है ।

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विश्व शांति हेतु खतरे के कौन कौन से कारक हैं । शांति की स्थापना कैसे हो सकती है, शास्त्रों की होड़ को कैसे रोका जा सकता है आदि । कई प्रकार के प्रश्नों का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाता है ।

उपरोक्त प्रवृत्तियों का मुख्य बल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सैद्धांतिकरण को बढ़ावा देना रहा है तथा इस युग में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सार्वभौमिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करना अति महत्वपूर्ण कार्य रहा है । सिद्धांत निर्माण की इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरुप अनेक आंशिक सिद्धांतों जैसे यथार्थवाद, संतुलन का सिद्धांत, संचार सिद्धांत, शांति, विधान दृष्टिकोण, व्यवस्था सिद्धांत, विश्व व्यवस्था प्रतिमान आदि का निर्माण हुआ है ।

1990 के दशक में जयंत बंदोपाध्याय ने अपनी पुस्तक जनरल थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस 1993 में मार्टिन कापलान के व्यवस्थापक सिद्धांत की कमियों को दूर करके एक सार्वभौमिक सिद्धांत की स्थापना की कोशिश की । परंतु वह भी अभी वाद प्रतिवाद के दौर में ही है । अतः सैद्धांतिकरण के मुख्य दौर के बावजूद शीतकालीन युद्ध अपनी वैचारिक संकीर्णता व अलगाव के कारण किसी एक सिद्धांत के प्रतिपादक बन रहा है ।

5) वैश्वीकरण व गैर सैद्धांतिकरण का युग 1991 से 2003 तक

शीत युद्ध के उपरांत युद्ध में सभी राष्ट्रों द्वारा एक आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत जुड़ना प्रारंभ कर दिया । इसलिए अब वैश्वीकरण, उदारीकरण, मुक्त बाजार व्यवस्था आदि का दौर प्रारंभ हो गया । इस संदर्भ में न केवल आर्थिक मुद्दों का ही महत्व बढ़ा है । अब तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्व बढ़ गया है । आज राष्ट्रीयता, अंतर्राष्ट्रीयता का विभेद समाप्त हो गया है । इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय सूची में काफी नए विषयों का समावेश किया गया है । जो राष्ट्रीय न रहकर अब मानव जाति की समस्याओं के रूप में उभर कर आए हैं ।

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वर्तमान विश्व की प्रमुख समस्याओं में आतंकवाद, पर्यावरण, ओजोन परत का खत्म होना, नशीले पदार्थों में मादक द्रव्यों की तस्करी, मानव अधिकारों का हनन आदि । प्रमुख मुद्दे उभरकर सामने आए हैं । जिनका राष्ट्रीय स्तरीय क्षेत्र की बजाय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हल निकालना जरूरी हो गया है । सैद्धांतिक स्तर पर 1945 से 1991 तक सार्वभौमिक स्थापना के प्रयास को धक्का लगा है ।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की इस संदर्भ में प्राथमिकताएं बदल गई हैं । उत्तर आधुनिकतावाद में अब  सार्वभौमिक सिद्धांतों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है । ऐतिहासिक संदर्भ एव प्राचीन परिवेश के प्रभाव को भी नकारा जा रहा है । अब स्वतंत्र मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं । बाहर के सिद्धांत गौण हैं । नए संदर्भ में आंशिक शोध अधिक महत्वपूर्ण बन गई है । उदाहरण स्वरूप नारीवाद, मानव अधिकार, पर्यावरण आदि विषयों पर अधिक बल देने के साथ-साथ चिंतन भी प्रारंभ हो गया है तथा युद्ध के बाद युग में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक स्वरूप, विषय सूची एवं विषय क्षेत्र पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गए हैं । सामान्य सिद्धांत स्थापना पर भी पल नहीं दिया जा रहा है । उसमें इसके बदले हुए परिवेश में अंतरराष्ट्रीय राजनीति महत्वपूर्ण ही नहीं अपितु स्वायत्तता की ओर अग्रसर प्रतीत हो रही है और विषय की सहायता हेतु आशावादी संकेत दिखाई देते हैं ।

तो दोस्तों यह था अंतरराष्ट्रीय राजनीति विज्ञान के अंतर्गत इसके विकास के चरण के बारे में । अगर आपको यह Post अच्छी लगी है तो , अपने दोस्तों के साथ ज़रूर Share करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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